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मंगलवार, 24 जनवरी 2017

दोपहर बनकर अक्सर न आया करो

दोपहर   बनकर

अक्सर  न   आया   करो,

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो।




चिलचिलाती   धूप    में

तपना   है दूर  तक,

कभी  शीतल  चाँदनी

में  भी  नहाया  करो।

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो।



सुबकता है  दिल

यादों  के  लम्बे  सफ़र  में,

कभी  ढलते  आँसू

रोकने  आ  जाया  करो।

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो।




बदलती   है   पल-पल

चंचल   ज़िन्दगानी,

हमें  भी  दुःख-सुख  में

अपने  बुलाया  करो।

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो।



दरिया    का   पानी

हो  जाय   न   मटमैला,

झाड़न   दुखों   की धारा  में

यों   न    बहाया    करो।

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो।
#रवीन्द्र  सिंह  यादव 

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