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शुक्रवार, 1 मई 2020

अज्ञात सफ़र

सफ़ेद कबूतर उड़ा साहिल से 

समुद्र में डूबते सूरज को देखने 

उड़ता गया... उड़ता ही गया!

अब समंदर के ऊपर था 

बस अँधेरा...घना अँधेरा!

रेत न पीछे नज़र आया 

न बहुत आगे तक...  

सफ़ेद कबूतर ने 

लौटने का निश्चय किया

जहाँ से उड़ा था 

उस ओर मुड़ा था 

थक-हारकर 

साहिल पर आ गिरा था 

ज्वार आया तो 

सुरक्षित ज़मीन पा गया था

सांसें सामान्य हुईं 

प्राची में लालिमा देख 

नवजीवन पाकर 

जिजीविषा के साथ 

उड़ गया ज्ञात परिवेश में 

अज्ञात सफ़र के अनुभव सुनाने।  

©रवीन्द्र सिंह यादव   

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