मत टिकाओ
उम्मीद को अपनी
किसी लफ़्फ़ाज़ के सहारे,
नहीं तो डूब जायेगी
नैया एक दिन
देखते रह जाओगे किनारे।
दरारें दिख रहीं हैं
दूर से मुझको
संयम के बाँध
हैं अब फूटने वाले ,
जायेंगे टूट जब एक दिन
कच्चे विश्वास के धागे,
कहेगा कौन तुमको
कि हो तुम हमारे।
हो बेहतरी की बात
या ख़ुशियों भरे दिन हों,
हलक़ सूखा है
अब तो इंतज़ार में
अब तो इंतज़ार में
लगते आज-कल अपने
ज्यों रौशनी बिन हों,
ज्यों रौशनी बिन हों,
देखता हूँ रोज़-रोज़
लुटते हुए सपने
लुटते हुए सपने
बेहरे हुए को
कोई कब तक पुकारे।
कोई कब तक पुकारे।
थाम लो दामन
वक़्त की चुनौती का
वक़्त की चुनौती का
राह अपनी बना डालो,
खोखले आश्वासन
होते नहीं ज़ख़्म का मरहम
होते नहीं ज़ख़्म का मरहम
बुझते चराग़ में
ज़रा-सा सब्र का
तेल फिर डालो,
ज़रा-सा सब्र का
तेल फिर डालो,
जिया जो
दूसरों के सपनों पर
दूसरों के सपनों पर
ज़िन्दगी में झेलता
ज़िल्लत वही सांझ-सकारे।
ज़िल्लत वही सांझ-सकारे।
# रवीन्द्र सिंह यादव