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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

भ्रष्टाचार-सहमति-असहमति-सम्मान

रंकों के लिए 

आपात योजना बनी

डाका डालने की 

सहमति पर बात बनी

मुर्दों की शिनाख़्त 

सरकारी दस्तावेज़ में 

रहस्यमयी बनाई गई

सिर्फ़ काग़ज़ पर 

हड़प योजना 

सफ़ाई से बनाई गई

डाके में मिली 

भारी-हल्की हिस्सेदारी 

बिना डकार पचाई गई

अनैतिक योजना में 

जो शामिल नहीं हुए 

उन्हें आदर्शवाद की 

चोखी चटनी चटाई गई

ज़ुबान खोलने 

क़लम चलाने की 

कलुषित क़ीमत बताई गई  

एक भव्य समारोह में 

अंगवस्त्रम ओढ़ाकर

प्रशस्ति-पत्र थमाकर

निर्लज्ज आँखों से 

चेहरा घूरते हुए

अंदर धू-धू जलती 

ईर्ष्यालु आग 

होंठों से दबाते हुए 

बेईमान हाथों से  

बेमन की ताली बजाई गई। 

©रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

नक़्शा


उस दिन बिटिया नाराज़ हुई थी 

तब चौथी कक्षा में पढ़ती थी 

भूगोल की परीक्षा में 

नक़्शा बनाने के भी नंबर  थे 

नक़्शे बनाते-बनाते 

उसे ग़ुस्सा आया 

मेरे पास आयी 

हाथ में थे कई काग़ज़ 

जिन पर बने थे कई नक़्शे 

लेकिन नहीं थे बनाने जैसे 

बालसुलभ तमतमाहट के साथ 

पूछा मुझसे-

ये नक़्शे टेढ़े-मेढ़े क्यों होते हैं ?

बड़े होकर समझना 

नक़्शों का बदलना     

नक़्शों का मिटना 

नक़्शों में समायी भावना

नक़्शों में निहित संभावना 

तिरोहित होती है भाईचारे की भावना    

क़ुदरत ने दिया था 

बस एक ही नक़्शा भूमि-जल से चहकता  

घुसेड़ दी है हमने नक़्शे में 

विस्तारवादी / संकीर्ण मानसिकता

राजनीति रणनीति और सुरक्षा 

नक़्शे की जड़ में छिपी है महत्त्वाकांक्षा

नक़्शों में सिमटी है आज दुनिया 

सुनते-सुनते गंभीर हुई मुनिया। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

गुरुवार, 21 जून 2018

ख़लिश दिल की

रोते-रोते 
ख़त लिखा 
अश्क़ों का दरिया
बह गया 
हो गए  
अल्फ़ाज़ ग़ाएब 
बस कोरा काग़ज़
रह गया
अरमानों की 
नाज़ुक कश्ती में 
गीले जज़्बात रख  
दरिया-ए-अश्क़ में
बहा दिया 
हसरतों का 
आज भी 
अंतर में 
जल रहा दीया 
गलने से पहले 
मिल जाय गर 
सुन लेना 
सिसकती सदाएँ  
महसूसना 
तड़प-ओ-ख़लिश पुरअसर। 

© रवीन्द्र सिंह यादव    

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