कोयल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कोयल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 31 जनवरी 2018

बसंत (हाइकु )







छाया बसंत 
है बसंत-बहार 
मुदित जिया 


महका बाग़ 
चहकी कली-कली 
कूकी कोयल 



बौराये आम 
फूली पीली सरसों 
हँसे किसान  

मस्त फ़ज़ाऐं 
गुनगुनी है धूप 
हरे शजर 

ढाक-पलाश 
सुर्ख़ हुआ जंगल 
महके फूल 







खिला बाग़ीचा 
फूलों पे चढ़ा रंग
रंगी है भोर

दिल की लगी 
यक़ीं-वफ़ा के गीत 
भाये मन को  

सूनी है साँझ
चंदा चुपचाप क्यों
रोया चकोर 

बुझते दिये 
मायूसियों के साये 
आ जाओ पिया 

# रवीन्द्र  सिंह यादव 


शुक्रवार, 10 मार्च 2017

आयी राम की अवध में होली



आयी   राम    की

अवध   में    होली ,

छायी  कान्हा  की

बृज    में   रंगोली।



पक   गयी  सरसों

बौराये    हैं   आम,

मनचलों  को  अब

सूझी   है  ठिठोली।

छायी   कान्हा  की


बृज    में   रंगोली।



भाये       मन      को

रंग    अबीर   गुलाल ,

मस्ताने    बसंत    में

कूक  कोयल   बोली।

छायी    कान्हा    की

बृज      में     रंगोली।





मिट     गये    मलाल

मलने     से   गुलाल,                                                                                                                                         
भरी मायूस मन  की

ख़ुशियों   ने   झोली।

छायी    कान्हा   की

बृज     में     रंगोली।













खेलो     होली    बन


राधा     नन्द - लाल ,


पिचकारी    ने    बंद


राह    अब     खोली।


छायी     कान्हा   की


बृज      में      रंगोली।




@रवीन्द्र  सिंह यादव


इस रचना  का यू-ट्यूब पर  (चैनल - MERE SHABD--SWAR) लिंक -https://youtu.be/ufs7srNvtAU

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...