राधा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राधा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

आयी राम की अवध में होली



आयी   राम    की

अवध   में    होली ,

छायी  कान्हा  की

बृज    में   रंगोली।



पक   गयी  सरसों

बौराये    हैं   आम,

मनचलों  को  अब

सूझी   है  ठिठोली।

छायी   कान्हा  की


बृज    में   रंगोली।



भाये       मन      को

रंग    अबीर   गुलाल ,

मस्ताने    बसंत    में

कूक  कोयल   बोली।

छायी    कान्हा    की

बृज      में     रंगोली।





मिट     गये    मलाल

मलने     से   गुलाल,                                                                                                                                         
भरी मायूस मन  की

ख़ुशियों   ने   झोली।

छायी    कान्हा   की

बृज     में     रंगोली।













खेलो     होली    बन


राधा     नन्द - लाल ,


पिचकारी    ने    बंद


राह    अब     खोली।


छायी     कान्हा   की


बृज      में      रंगोली।




@रवीन्द्र  सिंह यादव


इस रचना  का यू-ट्यूब पर  (चैनल - MERE SHABD--SWAR) लिंक -https://youtu.be/ufs7srNvtAU

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

धीरे - धीरे ज़ख़्म सारे



धीरे -  धीरे     ज़ख़्म       सारे

अब      भरने    को   आ   गए ,

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।



ज़िन्दगी     को     जब     ज़रूरत

उजियारे     दिन   की   आ    पड़ी,

लपलपायीं                 बिजलियाँ

गरजकर  काले  बादल  छा  गए। 

एक    बेचारा    दाग़ -ए -दिल  है

जिसको    ग़म    ही    भा    गए।




बाँसुरी      की    धुन    पे  थिरका

बृज   के    साथ    सारा   ज़माना,

श्याम   जब    राधा   से   मिलने

यमुना    तट   पर     आ      गए।

एक    बेचारा    दाग़ -ए -दिल   है

जिसको    ग़म    ही    भा    गए।




आज     फिर   आँगन     में    मेरे

नन्हीं      कलियाँ      खिल     रहीं,

गीत     फिर     इनको     सुनाओ

जो     दादी    नाना     गा      गए।

एक   बेचारा    दाग़ -ए -दिल   है

जिसको    ग़म    ही    भा    गए।




क्या      मनाएं      जश्न       हम

ज़िन्दगी       की     जीत       का,

बाँटने     को    थीं    जो      चीज़ें

हम     उन्हीं     को     खा     गए।

एक    बेचारा    दाग़ -ए -दिल   है

जिसको    ग़म    ही    भा     गए।

@रवीन्द्र  सिंह  यादव

इस रचना  को सस्वर  सुनने के लिए  लिंक - https://youtu.be/QdAzRuiZa8

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...