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शनिवार, 22 दिसंबर 2018

वक़्त



एक शिल्पी है वक़्त 

गढ़ता है दिन-रात

उकेरता अद्भुत नक़्क़ाशी 

बिखेरता रंग लिये बहुरँगी कूची  

पलछिन पहर हैं पाँखुरियाँ 

बजतीं सुरीली बाँसुरियाँ 

सृजित करता है 

स्याह-उज्ज्वळ इतिहास 

पल-पल परिवर्तित प्रकृति 

घड़ियाँ करतीं परिहास  

नसीम-सा गुज़रता है 

हर्ष-विषाद के पड़ावों से 

मरहम हो जाता है 

आप्लावित होता है भावों से 

उजलत मानव अभिलाषा 

कोसती है वक़्त को 

ख़ुद ठहरकर 

सुबह-शाम 

दोष देती वक़्त को  

वक़्त की गर्दिश को 

सीने से लगा लेते हैं हम 

ठोकरें और थपेड़े वक़्त के 

ज़ेहन में क्यों सजा लेते हैं हम ?

© रवीन्द्र सिंह यादव


उजलत = उतावली,व्यग्र 

नसीम = जो दूसरों की सहायता करता हो  

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