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शनिवार, 2 मई 2020

अपने चेहरे पर मुखौटा क्यों भला?

रेल-पटरी के ऊपर 

वर्षों पहले बने 

जर्जर ज़ंग लगे लोहे के पुल से 

गुज़रते हुए

चिंतनीय सवाल 

मुनिया ने बापू से पूछा-

"एक दिन 

यह पुल गिर जाएगा 

न जाने 

दिन का होगा कौनसा पहर 

चुपचाप अकेला गिरेगा 

या बरपाएगा 

गुज़रते लोगों पर क़हर?

फिर किसी की लापरवाही 

तय करने के लिए 

आयोग बनेगा

दोष तय करने का 

कब योग बनेगा?" 

बापू ने कहा-

"ख़ाली दिमाग़ शैतान की दुकान!

यह नहीं कोई विचार महान

कुछ और सोचो

तुम्हें बड़ा आदमी बनना है।"

"बड़ा आदमी नहीं!

संपूर्ण औरत!

अपने चेहरे पर 

मुखौटा क्यों भला?"

मुनिया चिहुँक पड़ी

मुनिया की समझदारी पर 

बापू की आँखें फटीं रह गयीं। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

ओस और मुनिया



जब

वातावरण में

समाहित  वाष्प  को

सिकोड़   देती  है  सतह  की  ठंडक,

तब

शबनम के दाने / ओस के मोती,

फूल-पत्तियों      पर      आसन     जमाते    हैं,

हमारे  मरने-मिटने  के  भय  को  लजाते   हैं।


मुनिया    समझदार    हुई,

पाँच    बसंत     पार    हुई,

बोली  एक   इतवार  को-

"पार्क  में  मैं  भी  चलूँगी,

कुलाँचें   मैं  भी  भरूँगी...!"


सवालों-जवाबों  के  बीच  पहुँचे  पार्क,

चमका   रही    थीं  ओस-कणों   को,

भोर      की     मनहर      रवीना,

ये  क़ुदरत  के आँसू   हैं  या  पसीना...?

कवितामयी / छोटे  मुँह   बड़ी  बात...!

सीधा  मन-मस्तिष्क  पर लुभावना आघात।


मैंने   कहा-

यह   ओस   है,

उसने कहा-

"ENGLISH  में   बताओ"

"DEW...!" -जवाब  मैंने  दिया,

इसे  तो  मेरे  टीचर  ने  वीडियो  में  दिखाया  था...

सुनकर  मेरे  सपनों  पर  ओस  पड़   गयी!

घर  आते-आते   सारी   ओस  झड़  गयी!!

©रवीन्द्र  सिंह यादव









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