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गुरुवार, 1 मई 2025

वक़्त और काया

बादलों की प्रतीक्षा में 

अनिमेष अनवरत ताकते हुए 

वृक्ष में क्या परिवर्तित हुआ?

ऋतुओं का संधिकाल आते-आते 

सूख गए हरित-पीत पत्ते, 

कुम्हलाए कोमल किसलय 

मुरझा गए सुकोमल सुमनालय

व्याकुलता बढ़ती रही छाल की  

काया क्षीण हुई विशाल वृक्ष की 

वक़्त का क्या गया 

बस स्मृतियों का ख़ज़ाना बढ़ गया

एक वार्षिक वलय और बढ़ गया 

मिला कोई घट गया 

पानी हवा से हट गया

लू के थपेड़े झेलकर 

गुलमोहर खिल उठा 

विपरीत मौसम में 

कौन किससे रूठा?  

©रवीन्द्र सिंह यादव 

 

रविवार, 16 जून 2024

तपिश और पेड़

चित्र: महेन्द्र सिंह 


 गमलों में पेड़ लगाकर 

आत्ममुग्ध होता समाज 

व्यथित है 

सूरज की प्रचंड तपिश से

हाँ, बदलेगा वातावरण 

बड़ी होती इस कोशिश से 


पेड़ की जड़ 

खींचती जल भूतल से 

पहुँचाती आँतरिक वाहिनियों के ज़रिये 

पत्ती के स्टोमेटा तक 

वाष्पोत्सर्जन वातावरण को देता ठंडक

छाया में आती राहत की ठसक

 

जो सूख गया या काटा गया पेड़ 

तो देखा गया जलते हुए 

सर्दी के अलाव में 

या घर की शोभा बनते हुए 


पेड़ तो स्वयं उगते हैं 

सजते-सँवरते हैं वन-उपवन होकर 

कुदृष्टि आदमी की उजाड़ती है वृक्ष 

अति भौतिकता का दास होकर

उजड़ते वन बसती बस्तियाँ 

बढ़ता वातावरण का तापमान 

जीवन के लिए ख़तरा


वृक्षों को जबरन मुक्ति देता आदमी 

कभी झाँक लेगा अपने भीतर 

रोते-सिसकते मिलेंगे 

चिड़िया,कोयल,मोर,बटेर,तीतर। 

 ©रवीन्द्र सिंह यादव

  


मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

साधन-संपन्न और साधनहीन

एक पौधा 

रोपा गया 

सबने दिया 

खाद-पानी

सुरक्षा देने की 

सबने ठानी 

पोषित पौधा पल्लवित पुष्पित हुआ

विशाल वृक्ष में तब्दील हुआ 

फलदार हुआ 

फलों को पाने की आशा में 

साधनहीन 

नीचे खड़े-खड़े 

रसीले फलों को 

निहारते रहे 

हवाई पहुँचवाले 

क्रेन आदि लाए

साथ सुरक्षा भी लाए  

सारे फल तोड़ ले गए

साधनविहीन शोर मचाते रह गए।   

© रवीन्द्र सिंह यादव 

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

पतझड़ के बीच



























एक सप्ताह पूर्व 

देखा था उदास पीपल को 

सहते वर्तमान पतझड़ के 

कायाकल्पी कोलाहल को

पातविहीन पीपल 

अनावृत अनमनी लाजवंती 

शाखाएँ-उपशाखाएँ

बेनूर वृक्ष था पीपल

एक-दो शेष थे पीत पात 

लटके थे नीड़ बस छह-सात

आज तो 

सुनहले सुकोमल किसलय 

झीनी हल्की हरी ओढ़नी-से 

लिपट गये हैं 

हवा में लहराते हुए

'करोना लॉक डाउन' को 

बेअसर बताते हुए

पंछी आकर 

पंख फड़फड़ाने लगे हैं 

गिलहरी-गिरगिट-बंदर 

धमा-चौकड़ी मचाने लगे हैं

इनके ललचाए नैना 

मधुयुक्त छत्तों पर लगे हैं    

पीपल के नीचे

एक शहरी बेघर का बसेरा है 

आती-जाती हरेक ऋतु 

उसका नया एक सबेरा है 

उसने समेटकर सहेजकर

उम्मीदों का गट्ठर बाँधे   

रख लीं हैं झरीं सूखीं पत्तियाँ

सूखी लकड़ी संग 

चूल्हा जलाने के लिये।  
  
©रवीन्द्र सिंह यादव



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