गुरुवार, 27 अगस्त 2026

जलप्रलय

जल जीवन है 
और मृत्यु भी 
बहार है 
तो विभीषिका भी

जल किलकारी है 
और चीख़ भी 
इंसानी दंभ को 
तोड़ती सीख भी

नींव, कंगूरा, 
दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे 
बह गये सब सपने 
उम्मीदें और भरोसे 

तोड़ता सीमाएँ 
सृष्टि का विकराल रूप  
आँचल माटी का 
धरता कैसे-कैसे रूप 

अल्ट्रा मॉडर्न तकनीक 
दृश्य क़ैद करती रही 
जलप्लावन की विकरालता में 
चीख़-पुकार दबती रही 

पुनः सजेंगे सँवरेंगे 
जिजीविषा के क्षितिज 
रोपे जाते रहेंगे  
इंद्रधनुषी आशाओं भरे बीज।    
©रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 23 अगस्त 2026

शब्द-युग्म

उसके मुखारबिंद से 

उच्चरित हुआ  

एक शब्द-युग्म  

और लग गये 

होम वर्क पर हम

उसके संगी-साथियों ने 

सफ़ेद झूठ-सी सफ़ाई दी 

ढिंढोरची करने लगे मुनादी। 

उत्साही शोधकर्त्ता 

पौराणिक ऐतिहासिक संदर्भ खोज लाये 

सामाजिक जवाबदेह व्यक्ति 

पिता-सा न ढूँढ़ पाये 

जो सिखाता रहा 

कौन कौआ, 

कौन कोयल हर बार

शब्द ऊर्जा रूप बदलती 

रहती संरक्षित संसार।   

©रवीन्द्र सिंह यादव 

 

मंगलवार, 11 अगस्त 2026

छलनी

आओ

आशाओं को 

महीन छलनी में 

रखकर देखते हैं 

और फिर 

छलनी को 

हौले-हौले 

रीतते हुए देखते हैं

बस देखना है 

आशाएँ 

औंधे मुँह तो नहीं गिरीं

या कोई 

सुगबुगाहट तो नहीं हुई। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 

 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

वह जेन ज़ी नहीं जेन अल्फा भारत की बेटी...

 

आक्रोश आवेश में थी वह भारत की बेटी 

देखकर पुलिस की क्रूर बर्बरता 
निहत्थे अहिंसक आंदोलनकारियों /महिलाओं पर 
पंद्रह वर्ष आयु पाने से नौ दिवस पूर्व 
दे आयी थी गाली प्रधानमंत्री को जंतर-मंतर पर 
पहचान उजागर कर दी 
डिजिटल हिंसा के ठेकेदारों ने 
एक स्त्री ही खड़ी हो गयी 
उस बेटी को क़ानूनी सबक़ सिखाने को 
धँसे गले से नज़र झुकाये आयी वीडिओ में 
सिटपिटाई-सी सार्वजनिक माफ़ी माँगने को
आत्मग्लानि से भर गया समूचा देश
देख क्रूर अट्टहास का वीभत्स परिवेश
विकृत राजनीति के समक्ष विवश-लाचार हुई प्रबुद्ध मानवता
माँ-बेटी स्वयं लड़ीं दहशत-घृणा से, दबाये भाव-विह्वलता
भीड़-तंत्र के न हो हवाले हमारा प्यारा देश
शराफ़त अब और न रहो अपाहिज-ख़ामोश!

©रवीन्द्र सिंह यादव 


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