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गुरुवार, 20 मार्च 2025

सत्य की दीवार


सत्य की दीवार 

उनका निर्माण था

कदाचित उन्हें 

सत्य के मान का भान रहा होगा

सरलता और सादगी का जीवन 

उनकी पहचान रहा होगा

मिथ्या वचन,छल,पाखंड,क्रूरता,अन्याय और दंभ

तब उस पवित्र दीवार से 

परे ही रहे होंगे

नकारात्मक मूल्यों की गंध पर 

विवेक की पंखुड़ियों का 

सतत सख़्त पहरा रहा होगा

कालांतर में क्षरण हुआ 

सजगता और 

सत्य के प्रति आग्रह का   

छल अति क्षुधित पाषाण-सा 

टकराता रहा सत्य की दीवार से 

अंततः दीवार क्षतिग्रस्त हुई 

और बन गए झरोखे ही झरोखे

पतित मूल्यों के 

उस प्राचीन दीवार में... 

©रवीन्द्र सिंह यादव       

      

रविवार, 8 दिसंबर 2024

अभिभूत

बालू की भीत बनाने वालो 

अब मिट्टी की दीवार बना लो

संकट संमुख देख 

उन्मुख हो 

संघर्ष से विमुख हो गए हो 

अभिभूत शिथिल काया ले 

निर्मल नीरव निर्झर के मार्ग में 

हे शिल्पी! 

शिलाखंड पर कब से बैठे हो

उठो! मुक्ति-मार्ग संशय से मिलता तो

हर भटके राही को मंज़िल की क्यों फ़िक्र हो!

करो प्रहार हथौड़ा हाथ है 

सुगढ़ मूर्ति साकार हो! 

©रवीन्द्र सिंह यादव    



शब्दार्थ सम्मुख 

1. बालू = रेत, बालुका , Sand 

2. भीत = भित्ति , दीवार , Wall 

3. सम्मुख = सामने, आगे , समक्ष  

4. उन्मुख = ऊपर की ओर ताकता हुआ, उत्कंठा से देखता हुआ  

5. विमुख = मुँह फेरना, अलग होना, जिसके मुँह न हो, मुखरहित 

 6. अभिभूत = हारा हुआ , पराजित 

7. शिथिल = ढीला-ढाला, थका हुआ, 


 

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

असीम वेदना:दीवार / प्रकृति / मानुष


दीवार उठती है

बाँटती है

आचार-विचार

रहन-सहन

दशा-दिशा

अँगारे-धुआँ

कोई सेंध लगाकर

देख लेता है आरपार

एक ओर

कलात्मक चित्रकारी की भरमार

दूसरी ओर

कीलें ठोककर अस्थायी छप्पर

हवा में हवा होती नैतिकता 


के परिवेश में

नंगनाच करती भौतिकता

बैठेंगे खग-वृन्द दीवार पर

किसी की पूँछ

किसी की चोंच

देखेंगे नौनिहाल

दीवार ढोती है

व्यक्ति की निजता

अस्थायी सुरक्षा का पता 

संकीर्णता के कीड़े-मकोड़े

सहती है महत्त्वाकाँक्षा के हथौड़े

प्रकृति सिहर उठती है

असीम वेदना से

सहती है नादान इंसान के

स्वकेन्द्रित क्रिया-कलाप

हवा-पानी धूप-चाँदनी से

कहती है-

भेदभाव हमारी नीयत में नहीं

सारमय नीरव इशारे समझने की दक्षता

उन्मादी मग़्ज़वाली खोपड़ी में नहीं।

© रवीन्द्र सिंह यादव

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

तस्वीर

वर्षों से दीवार पर टंगी 

तस्वीर से 

धूल साफ़ की 

आँखों में 

करुणा की कसक 

हया की नज़ाकत 

मुस्कान के पीछे 

छिपा  दर्द 

ये आज भी फीके कहाँ  

चीज़ों की उम्र होती है 

प्रेम की कहाँ 

लेकिन आँखों ने 

इशारों में कहा है 

अब प्रेम का दायरा 

सिकुड़ता जा रहा है। 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

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जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...