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सोमवार, 19 नवंबर 2018

नदी तुम माँ क्यों हो .....

नदी तुम माँ क्यों हो...?

सभ्यता की वाहक क्यों हो...?

आज ज़ार-ज़ार रोती क्यों हो...?   

बात पुराने ज़माने की है 

जब 

गूगल 

जीपीएस

स्मार्ट फोन  

कृत्रिम उपग्रह 

पृथ्वी के नक़्शे 

दिशासूचक यंत्र 

आदि नहीं थे 

एक आदमी

अपने झुण्ड से 

जंगल की भूलभुलैया-सी 

पगडंडियों पर चलते-चलते 

पैर की नस दबने / चढ़ने / तड़कने से 

भटककर छिटककर बिछड़ गया 

घिसटते-घिसटते 

अग्रसर हुआ 

ऊँचे टीले से 

साथियों को 

आवाज़ लगायी 

कोई सदा  लौट के आयी

बस प्रतिध्वनि ही 

निराश लौट आयी 

सुदूर क्षितिज तक 

व्याकुल थकी नज़र दौड़ायी 

घने वृक्षों के बीच 

नीलिमा नज़र आयी 

जीने की आस जागी 

आँखों में रौशनी जगमगायी

हिम्मत करके उतरा 

ऊँघती कटीली घाटियों में 

चला सुनसान वन में

उस नीलिमा की ओर 

दर्द सहते-सहते हौले-हौले 

पैर को जकड़ा 

नर्म वन लताओं से 

रास्ता तय किया 

एक टीला और मिला 

अब एक नदी नमूदार हुई

चलते-चलते तन से 

निचुड़ा पानी

प्यासे को लगा 

ख़त्म हो जायेगी कहानी 

बढ़ती प्यास ने 

दर्द विस्मित किया 

प्यासे और नदी के बीच 

दूरी न्यूनतर होती गयी 

नदी से कुछ ही दूरी पर 

मूर्छा आने लगी 

पाकर नदी का किनारा 

राहत की साँसें भी भारी हुईं 

तपती रेत में 

बोझिल क़दमों  से 

प्यासा चला 

उभरे पाँवों में 

छालों ने छला  

अब नदी का पानी 

कुछ ही क़दम दूर था 

पाँवों में प्यासे को 

ठंडक महसूस हुई 

लगा ज्यों माँ ने 

लू लगने पर 

तलवों में बकरी का दूध  

और प्याज़ का रस मला हो 

नस तड़की और 

गिर पड़ा औंधे मुँह 

चरम पर थी प्यास और पीर 

बस दो हाथ की दूरी पर था

कल-कल करता बहता 

नदिया का निर्मल नीर  

जलपक्षी जलक्रीड़ा में थे मग्न 

बह रही थी तपिश में 

राहतभरी शीतल पवन  

घिसटकर पानी तक 

पहुँचने की हिम्मत  रही 

एक लहर आयी 

मुँह को छुआ  

लगा जैसे माँ ने 

पिलाया हो पानी 

लगाकर ओक 

जीवन तरंगित हुआ

बिखरा जीवन आलोक 

बैठकर जीभर पानी पिया

जिजीबिषा जीत गयी 

पाकर क़ुदरत का वरदहस्त 

प्यास बुझाकर प्यासे ने  

नदी को माँ कहकर

श्रद्धा से सम्बोधित किया  

साधुवाद दिया 

यह ममता बढ़ती रही

कालान्तर में 

आस्था हो गयी  

इंसान ने नदी को 

माँ जैसा मान-सम्मान 

देने का विचार दिया

परम्पराओं-वर्जनाओं का 

रोपड़-अनुमोदन किया 

नदियों के किनारे 

सभ्यताओं ने 

पैर पसारने का  

अनुकूल निर्णय लिया 

जीवनदायिनी नदिया का 

आज हमने क्या हाल किया है?

समाज का सारा कल्मष 

नदियों में उढ़ेल दिया

क्या फ़ाएदा 

इस ज्ञान-विज्ञान 

आधुनिक तकनीक 

सभ्य समाज की 

तथाकथित समझदारी  का

जिसने इंसान को 

प्रकृति की गोद से 

जबरन अलहदा किया!! 

© रवीन्द्र सिंह यादव



मंगलवार, 19 सितंबर 2017

आँखें


ख़ामोश अदा चेहरे की,

व्यंगपूर्ण मुस्कान 

या 

ख़ुद को समझाता तसल्ली-भाव....?

आज आपकी डबडबाई आँखों में 

आयरिस के आसपास,

तैरते हुए चमकीले मोती देखकर.....

मेरे भीतर भी 

कुछ टूटकर बिखर-सा गया है......!  



ज़ार-ज़ार रोती आँखें 

मुझे भाती नहीं,

आँखें हैं कि

शिकायती-स्लेट बनने से 

अघाती नहीं। 


आपका कभी आँचल भीगता है 

कभी  मेरा  रुमाल,

बह जायें आँसू फिर देखिए  

चंचल नयनों के कमाल। 



दिल किसी का

यादें किसी की, 

सपने किसी के 

चक्षु किसी के,

प्रतीक्षा किसी की 

धड़कन किसी की,  

चैन-ओ-क़रार किसी का 

बे-क़रारी किसी की,

अक्स किसी का 

आँखें किसी कीं, 

दिल में समायी प्रीत किसी की 

कहो कैसा क़ुदरती अनुबंध है?


किसी दामन में सर झुकाकर 

सुकूं मिलता है भरी आँखों को,

क़लम कहाँ लिख पाती है  

 पाकीज़गी-ए-अश्क़ के उन ख़्यालों को।   


आप मेरे दिल में उतरे 

मैं  आपके  दिल  में,

गुफ़्तुगू  ख़ूब  हुई 

दो दिलों की महफ़िल में, 

तड़प के सिवा कुछ मिला क्या....?

खनकते एहसास लिये  

तमन्नाओं का हसीं कारवाँ मिला,

तभी तो चल पड़ा 

इश्क़ का नाज़ुक-सा सिलसिला। 


मैं अपनी गुस्ताख़ी  

ढूँढ़कर  ही  रहूँगा, 

ख़ज़ाना-ए-दिल बहने का 

सबब तलाश कर ही लूँगा, 

क्योंकि आपने 

आज मुझे टफ टास्क दिया है -

"दिल में ऐसा क्या चुभता है 

कि ज़ुबाँ चुप रहती है,

आँखें बयाँ करती हैं?"



कब से हम खुलकर  मुस्काये नहीं 

गये वक़्त की रुस्वाइयाँ  बयां करती हैं,

चेहरे  पर उदासी का पहरा 

और झुकी-झुकी पलकें 

बे-रूखी का क़िस्सा बयां करती हैं। 



है  हार  क़ुबूल  मुझे

नहीं मैं अना-पसंद 

रणछोड़दास जी का 

पथ अनुगमन करता हूँ,

चेहरे पर खिली तबियत हो  

ईष्ट  को  नमन  करता  हूँ।  

बस यही दुआ और इल्तिजा करता हूँ-

ज़िन्दगी को जीभर खिलने-मुस्कराने दो अब,

सपनों में भी आँसुओं को  न ज़ाया  होने दो अब। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 

शब्दों के अर्थ /पर्यायवाची / WORD  MEANING 

आयरिस = आँख की पुतली / IRIS / PUPIL 

पाकीज़गी-ए-अश्क़= आँसुओं की पवित्रता / PURITY OF TEARS

सिवा (फ़ारसी पूर्वसर्ग) = सिवाए,अतिरिक्त,अलावा/EXCEPT   

ख़ज़ाना-ए-दिल= आँसू / TEARS 

गुस्ताख़ी  = ढिठाई, बे-अदबी,अशिष्टता /ARROGANCE 

टफ  टास्क = कठिन, चुनौतीभरा  कार्य / TOUGH TASK 

रुस्वाइयाँ = बदनामियाँ / DISGRACES 

अना-पसंद = अहंकारवादी,अहंवादी, अपने अहंकार को आगे रखने वाला / Egotist 

रणछोड़दास =श्रीकृष्ण का एक नाम / LORD KRISHNA 

ज़ाया = बरबाद ,नष्ट, नाश  / WASTE / DESTROY

ज़ार-ज़ार रोती आँखें = अत्यंत फूट-फूटकर रोती हुई आँखें /EYES WEEPING UNCONTROLLABLY  

चैन-ओ-क़रार = मन की शांति / PEACE OF MIND/CONTENTMENT


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