एक सिंदूरी शाम
गुज़र रही थी
थी बड़ी सुहावनी
लगता था
भानु डूब जाएगा
अकूत जलराशि में
चलते-चलते
बालू पर पसरने का
मन हुआ
भुरभुरी बालू पर
दाहिने हाथ की
तर्जनी से
एक नाम लिखा
सिंधु की दहाडतीं
प्रचंड लहरें
अपनी ओर आते देख
तत्परता से लौट आया
अगली भोर फिर गया
सुखद अचरज से देखा
एक घोंघा
वही नाम
बालू पर लिख रहा था...
© रवीन्द्र सिंह यादव

