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रविवार, 29 दिसंबर 2024

सबसे लंबी रात

गोधूलि वेला बीतने पर 

तम के तट पर 

उतर रही थी यामिनी 

उजाले क़िस्तों में 

ख़ुद-कुशी कर रहे थे 

बेसुरे संगीत में 

चीख़ उठी थी रागिनी

बसेरों में पंछी लौट चुके थे 

तम के गहराने पर आश्वस्त 

उल्लू-चमगादड़  

आह्लादित हो चुके थे

21-22 दिसंबर साल की सबसे लंबी रात 

सबेरा होने के पूर्वाग्रह से भयभीत थी 

चाहती थी और लंबी होना 

तो मुर्ग़ों को बाँग न देने के लिए 

धमका दिया

मुर्ग़े आराम-तलबी के ग़ुलाम थे तो चुप रहे

कोहरे से भी साँठगाँठ हुई    

फिर भी सुबह हो गई  

उजालों की बाढ़ में 

अँधेरा ग़ाएब हो गया

वक़्त की ठोकर में 

तम का अहंकार ढह गया। 

©रवीन्द्र सिंह यादव    



शनिवार, 4 दिसंबर 2021

क्रोध

सूनी यामिनी में 

जलते-जलते क्रोध में 

नज़र चाँद पर जा ठहरी 

सर्दियों की रात में 

न जाने क्यों लगा ज्यों तपती दोपहरी 


शुभ्र शांत शीतल चाँदनी की आभा में 

क्रोध समाता गया 

समाता ही चला गया...

ग्लानिभाव उत्सर्जित हुआ

नहीं होते जब  

चाहे मुताबिक़ 

चीज़ें 

घटनाएँ 

परिस्थितियाँ 

आँकड़े 

हथियार 

लेखनी 

संमुख-वाणी 

लोगों का व्यवहार

जेब का वज़्न

सोचे परिणाम 

तब क्रोध का ज्वालामुखी फूट पड़ता है 

क्रोधित के मस्तिष्क से न्यूरॉन नष्ट करता है 

लक्षित को विचलित करता है 

क्रोधावेग वक्री होने पर 

आकलन होता है 

शारीरिक 

व्यावहारिक 

आर्थिक 

सामाजिक 

वैश्विक नुकसान की अंधी गली का 

आगे बिछा मिलता है असहयोग के रेशों से बुना ग़लीचा 

कितना कोसा गया 

दबाया गया 

आलोचा गया 

बेचारे क्रोध को 

एक विद्रूप मनोविकार 

क्रोधी को 

पछतावे के सरोवर में डुबो देता है 

क्रोध-वृक्ष की जड़ों में 

ईर्ष्या 

राग-द्वेष 

बदलाभाव 

अहंकार 

घृणा

अपमानित करने की मंशा

असफलता से उत्पन्न कुंठा

नकारात्मक बारम्बारता 

स्वयं को सही सिद्ध करने की ठेठ ज़िद 

ग़लत को सही कहने का ढीठपन 

न जाने कब समझेगा इंसान 

क्रोध भी सकारात्मक चादर ओढ़ लेता है 

जब 

खड़ा हो जाता है 

पीड़ित पक्ष के साथ

ताकतवर पर क्रोध करके

निरीह का थाम लेता है हाथ

क्रोध को वृहद उद्देश्यों में

ढलते हुए 

हमने पाया है

क्रोध कुछ सार्थक कथाएँ भी लाया है 

शिव का राजा दक्ष पर क्रोध  

ऋषि वाल्मीकि का

क्रोंच पक्षी के जोड़े से

एक को मारते बहेलिए पर क्रोध

ब्रह्मऋषि विश्वामित्र का महर्षि वशिष्ठ पर क्रोध 

क्रोधी-ऋषि दुर्वासा के श्राप-वरदान में लिपटा क्रोध 

राम का सागर और लक्ष्मण पर क्रोध

रावण का विभीषण पर क्रोध

ऋषि मुचुकुंद का कालयवन पर क्रोध 

कृष्ण का शिशुपाल, दुर्योधन और अश्वास्थामा पर क्रोध 

धृतराष्ट्र का भीम के लौह पुतले पर क्रोध

विद्योत्मा का कालिदास पर क्रोध

रत्नावली का तुलसीदास पर क्रोध

चाणक्य का राजा घनानंद पर क्रोध

कबीर का पाखंडियों पर क्रोध

दंगाइयों का निरीह नागरिकों पर क्रोध 

सम्राट अशोक का कलिंग युद्ध में हाहाकार! 

दिल्ली में नादिर शाह का चालीस दिनों तक नरसंहार!!

इन क्रोधों की कहानियाँ 

साथ लिए फिरता है समाज

फिर भी क्रोध के अंधकूप में बैठा है आज  


बस...बस...बस...!

फ़सादात में 

समाज के सतत उलझते-झगड़ते लड़ते रहने से  

लाभ की पोटली कौन उठा रहा है?

वो जो छिपकर तुम्हें क्रोधी बना रहा है 

अपने लिए अनुकूल माहौल बना रहा है 

तुम तो फटेहाल कंगाल हो जाओगे! 

और क्रोध के कारण को जानकर 

अंत में ख़ुद को ही कोसते रह जाओगे...

© रवीन्द्र सिंह यादव   

 

गुरुवार, 28 मई 2020

कल-आज-कल / लघुकथा


         वह एक शांत सुबह थी जेठ मास की जब बरगद की छाँव में
स्फटिक-शिला पर बैठा वह सांस्कृतिक अभ्युदय की कथा सुना रहा था।
नए संसार के साकार होने का सपना अपने सफ़र पर था जो नए-नए
सोपान चढ़ता जा रहा था। मद्धिम होती जा रही थी बीती यामिनी के तमस
की तासीर और शांत क्षितिज की परतें वेधता हुआ उदीयमान सूरज उजाले
की कविता लिख रहा था। ताज़ा हवा के चंचल झोंके धवलकेशी सर पर
लहरें निर्मित कर रहे थे। 

       उसने एक गंभीर मननशील दृश्य उपस्थित किया-
"अतीत की डबडबाई आँखों में अव्यक्त वेदना समाई है जो शिकायती
लहज़े में शायद कहती है-
हे वर्तमान!
मैंने तो नहीं सौंपा था तुम्हें ऐसा हो जाने का सपना। मानवता की कैसी
मनवांछित परिभाषा आत्मसात कर ली है तुमने?
कला-संगीत-साहित्य के प्रति कैसी निहायत ही उथली समझ विकसित कर रहे हो। मैंने तो स्वयं को मिटाकर तुम्हें हर हाल में बेहतर होने के लिए गढ़ा है।
कल भविष्य जब तुम्हें नकारेगा, दुत्कारेगा; तुम्हारी मंशा पर उँगली
उठाएगा और तुम्हारे किए-धरे को ख़ारिज करेगा तब तुम क्या करोगे?"

      अनसुना करते हुए 
वर्तमान बेशर्मी से मुँह फेरकर अपने अस्तित्त्व के 
झंझावात में उलझ जाता है। सूर्य अब चढ़ आया था पीपल की फुनगी तक
श्रोता / अनुयायी-वृंद उठा भूख मिटाने के संघर्षमय प्रबंध में जुट गया।

©
रवीन्द्र सिंह यादव     


शब्दार्थ 

जेठ मास = ज्येष्ठ महीना 

स्फटिक-शिला = स्फटिक (QUARTZ / एक प्रकार का सफ़ेद चमकीला सुंदर पत्थर / खनिज ) पत्थर का बड़ा टुकड़ा या हिस्सा,पाषाण

 अभ्युदय = और बेहतर होने की स्थिति, उन्नति, वृद्धि, तरक़्क़ी                                          / AGGRANDIZEMENT, ELEVATION 

मद्धिम = अपेक्षाकृत कम, मंदा, मंद, धुँधला, निष्प्रभ, हल्का / DIMMING 

यामिनी = रात,रात्रि,रजनी,रैन,निशा,तमा,तमस्विनी,विभावरी / NIGHT 

धवलकेशी सर = जिस सर( मस्तक / HEAD) पर सफ़ेद बाल (WHITE                                   HAIRS) हों, जैसे- धवलकेशी न्यायाधीश,                                                   साहित्यकार,महात्मा, बुज़ुर्ग़ 

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जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...