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रविवार, 25 सितंबर 2022

समय के साथ

युगों-युगों में 

समय के साथ 

समाज सभ्य हुआ 

सुसंस्कृत होने की प्रवृत्ति का 

सतत क्षय हुआ

आज अवांछित अभिलाषाओं का 

अनमना आलोक 

अभिशप्त यंत्रणा के 

अंधड़ में ढल गया है 

भव्यता,भौतिकता के 

विस्तार का बीज 

लालच के गर्भ में पल रहा है  

विवेकहीन मस्तिष्क 

भावविहीन ह्रदय

क्षत-विक्षत भावनाओं का 

अंबार लादे 

बैल-सा जुते रहने की 

मंत्रणा कर 

सो गए हैं

आस्तीन का सॉंप डसेगा  

तंद्रा टूटेगी

तब तक  

समय रेत-सा फिसलकर

भावी पीढ़ियों की 

आँखों की किरकिरी बन चुका होगा!

© रवीन्द्र सिंह यादव  


शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

उठ खड़ी होती है जिजीविषा


नाव डगमग डोली 

तो 

माँझी पर 

टिक गयीं 

आशंकित आशान्वित आँखें, 

कोहरा खा गया 

दिन का भी उजाला 

अनुरक्त हो भँवरे की 

प्रतीक्षा कर रहीं सुमन पाँखें। 


सड़क-पुल के टेंडर 

अभी बाक़ी हैं 

कुछ अनजाने इलाक़ों में 

बहती नदियों और पगडंडियों के, 

अपने आदमी को 

मिले सरकारी सौग़ात 

इस तरह भँवर में 

अनवरत घूमते सोपान प्रगति के।   


विकल है आज तो बेकल मन 

परिवेश में गूँजता 

चीत्कार का व्याकुल स्वर,

प्रभा-मंडल में यह कैसा नक़ली आलोक 

नीरव निशा की गोद में 

तनिक विश्राम करके 

उठ खड़ी होती है जिजीविषा 

अनायास सिहरन का उन्मोचन कर।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

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जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...