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मंगलवार, 1 सितंबर 2020

मधु,मानव और मधुमक्खियाँ

परागरहित चंपा पुष्प

उपेक्षित भाव की 


पीड़ा से गुज़रता है

जब मधुमक्खियाँ

उससे किनारा कर जातीं हैं

पराग चूसने

नीम के फूलों तक चलीं जातीं हैं

पराग देकर

फूल खिल जाते हैं

फूल होने पर इठलाते हैं

मानव-ज़ात को

शहद का छत्ता देकर

मधुमक्खियाँ 


अतिशय आनंद से 

आप्लावित हो चहकतीं हैं

वे आशान्वित रहतीं हैं

वे जानतीं हैं

उनका श्रम-ज्ञान ज़ाया नहीं होगा

अनेक फूलों से 


संग्रहित हुए पराग से 

निर्मित निर्मल मधु

उस मानव में बसी 


कलुषता मिटाएगा

जो मानव-मानव में भेद करता है

किसी न किसी फूल का पावन पराग

उसकी जिव्हा से मस्तिष्क तक


ह्रदय से रग-रग तक

पवित्र विचारों की

मिठास घोलेगा


मन-बुद्धि-संस्कार के 

सँकरे रास्ते खोलेगा

और वह एक दिन

प्रकृति को धन्यवाद बोलेगा। 


© रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

एक आवारा बदली


भुरभुरी भूमि पर उगे 
किरदार-से कँटीले कैक्टस
निर्जन परिवेश पर 
उकताकर कुंठित नहीं होते
ये भी सजा लेते हैं 
अपने तन पर काँटों संग फूल   
सुदूर पर्वतांचल में 
एक मोहक महक से महकती 
स्वागतातुर वादी  
रंग-विरंगे सुकोमल सुमनों से सजीं सुरम्य क्यारियाँ 
पुकारतीं तितलियों को 
कुसुम-दलों पर छिटकीं धारियाँ 
मधुमक्खियाँ मधुर पराग पीने पधारतीं 
एक आवारा बदली 
बरसने से पहले 
निहारती दोनों दृश्य।  

© रवीन्द्र सिंह यादव  
   

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