आक्रोश आवेश में थी वह भारत की बेटी
©रवीन्द्र सिंह यादव
साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
आक्रोश आवेश में थी वह भारत की बेटी
©रवीन्द्र सिंह यादव
आईना दिखाने वाले
कहाँ ग़ाएब हो गए?
शायद वे
घृणा का गान सुनते-सुनते
लहू का घूँट पीते-पीते
जान की फ़िक्र में पड़ गए...
ऐब तो दूसरे ही बता सकते हैं
इस कथन के भी पाँव उखड़ गए...
हरा-भरा है देश हमारा
फिर मिसरी की डली के लिए
एक मासूम की आँखों में
गहरी उदासी क्यों है?
कहते हो
क़ानून का राज है देश में
तो फिर
हत्यारों, बलात्कारियों;दंगाइयों को
मिल रही शाबाशी क्यों है?
तुम आईना तोड़ भी दो
अपने इंतज़ामों से
हम कदापि न घबराएँगे
वक़्त गर्दन पकड़कर
झुकाएगा एक दिन
तुम्हारा वीभत्स चेहरा
मक्कारियाँ उसकीं
चुल्लूभर पानी में हम दिखाएँगे।
© रवीन्द्र सिंह यादव
जल जीवन है और मृत्यु भी बहार है तो विभीषिका भी जल किलकारी है और चीख़ भी इंसानी दंभ को तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा, दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...