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शनिवार, 8 अगस्त 2026

वह जेन ज़ी नहीं जेन अल्फा भारत की बेटी...

 

आक्रोश आवेश में थी वह भारत की बेटी 

देखकर पुलिस की क्रूर बर्बरता 
निहत्थे अहिंसक आंदोलनकारियों /महिलाओं पर 
पंद्रह वर्ष आयु पाने से नौ दिवस पूर्व 
दे आयी थी गाली प्रधानमंत्री को जंतर-मंतर पर 
पहचान उजागर कर दी 
डिजिटल हिंसा के ठेकेदारों ने 
एक स्त्री ही खड़ी हो गयी 
उस बेटी को क़ानूनी सबक़ सिखाने को 
धँसे गले से नज़र झुकाये आयी वीडिओ में 
सिटपिटाई-सी सार्वजनिक माफ़ी माँगने को
आत्मग्लानि से भर गया समूचा देश
देख क्रूर अट्टहास का वीभत्स परिवेश
विकृत राजनीति के समक्ष विवश-लाचार हुई प्रबुद्ध मानवता
माँ-बेटी स्वयं लड़ीं दहशत-घृणा से, दबाये भाव-विह्वलता
भीड़-तंत्र के न हो हवाले हमारा प्यारा देश
शराफ़त अब और न रहो अपाहिज-ख़ामोश!

©रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 14 सितंबर 2022

मिसरी की डली के लिए

आईना दिखाने वाले 

कहाँ ग़ाएब हो गए?

शायद वे 

घृणा का गान सुनते-सुनते 

लहू का घूँट पीते-पीते 

जान की फ़िक्र में पड़ गए...

ऐब तो दूसरे ही बता सकते हैं

इस कथन के भी पाँव उखड़ गए... 

हरा-भरा है देश हमारा 

फिर मिसरी की डली के लिए 

एक मासूम की आँखों में 

गहरी उदासी क्यों है?

कहते हो 

क़ानून का राज है देश में 

तो फिर 

हत्यारों, बलात्कारियों;दंगाइयों को 

मिल रही शाबाशी क्यों है? 

तुम आईना तोड़ भी दो

अपने इंतज़ामों से 

हम कदापि न घबराएँगे  

वक़्त गर्दन पकड़कर 

झुकाएगा एक दिन  

तुम्हारा वीभत्स चेहरा 

मक्कारियाँ उसकीं 

चुल्लूभर पानी में हम दिखाएँगे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव   


शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश


अरे!

यह क्या ?

अराजकता में झुलसता मेरा देश,

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश।


सरकारी शब्दजाल ने

ऊबड़खाबड़ घाटियों में धकेला है,

शहर-शहर विरोध का

महाविकट स्वस्फूर्त रेला है,

होंठ भींचे मुट्ठियाँ कसते 

बेरोज़गार नौजवान

कोई मुँह छिपाकर देशद्रोही

जलाता अपना ही प्यारा देश,

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश।


रक्षकों को भक्षक बनते देख रहा हूँ,

गुनाहगार को सरपरस्ती मिलते देख रहा हूँ,

नेताओं को ज़हर उगलते देख रहा हूँ,

दुष्ट ने धारण किया है

भलेमानस का नक़ली वेश,

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश।


दबाने के लिये विरोधी-स्वर

केस ही केस दर्ज़ करती सरकार

औरतों के बदन से खसोट लेगी जेवर

बच्चों के मुँह से कौर

कुछ वकीलों के हो जायेंगे

सफ़ेद से गहरे काले केश

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश।


मानवता के मख़ौल में

खीज नहीं तरस आता है,

देखिए!

चरित्र-निर्माण का भव्य भवन

अब कितना खोखला नज़र आता है,

नफ़रत के तह-ख़ानों में

बैठे हैं सियासतदाँ

इनको भाता सड़कों पर

बहता ख़ून और क्लेश

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश।


दमन दहशत दुर्भावना से

जी नहीं भरता सत्ताधीशों का,

अपने लबादे में रखते हैं ख़ंजर छिपाकर

क़त्ल होता नागरिक के नाज़ुक अरमानों का

गुम है रहबर कहीं बेचारे मासूम शीशों का,

धनपति पाखंडी अवसरवादी

जमकर लूट रहे हैं देश,

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश।

© रवीन्द्र सिंह यादव
    

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

कन्धों पर सरहद के जाँबाज़ प्रहरी आ गये

मातम का माहौल है 

कन्धों पर सरहद के

जाँबाज़ प्रहरी आ गये 

देश में शब्दाडम्बर के 

उन्मादी बादल छा गये 

रणबाँकुरों का रक्त 

सड़कों पर बहा 

भारत ने आतंक का 

ख़ूनी ज़ख़्म सहा 

बदला! बदला!!

आज पुकारे देश हमारा

गूँज रहा है 

गली-चौराहे पर 

बस यही नारा 
 
बदला हम लेंगे 

फिर वे लेंगे....  

बदला हम लेंगे 

फिर वे लेंगे....

हम.... 

फिर वे......

केंडिल मार्च में 

भारी आक्रोशित मन होगा 
   
मातम इधर होगा

मातम उधर भी होगा

हासिल क्या होगा 

यह अंतहीन सिलसिला 

ख़त्म हो 

समाधान हो

विवेक जाग्रत हो 

सेना सक्षम हो

निर्णय क्षमता विकसित हो

स्टूडियो में एंकर लड़ते युद्ध

रैलियों में नेता भीड़ करते क्रुद्ध

लाल बहादुर शास्त्री से सीखो 

निर्णय लेना

जय जवान 

जय किसान 

तब इतराकर कहना

भय से मिलता वोट 

जिन्हें वे अब जानें  

मत समझो सस्ती हैं 

धरती के लालों की जानें !

दुश्मन को सक्षम सेना सबक़ सिखायेगी, 

बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनायेगी। 

© रवीन्द्र सिंह यादव     

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