आयी राम की
अवध में होली ,
छायी कान्हा की
बृज में रंगोली।
पक गयी सरसों
बौराये हैं आम,
मनचलों को अब
सूझी है ठिठोली।
छायी कान्हा की

बृज में रंगोली।
भाये मन को
रंग अबीर गुलाल ,
मस्ताने बसंत में
कूक कोयल बोली।
छायी कान्हा की
बृज में रंगोली।

मिट गये मलाल
मलने से गुलाल,
भरी मायूस मन की
ख़ुशियों ने झोली।छायी कान्हा की
बृज में रंगोली।
खेलो होली बन
राधा नन्द - लाल ,
पिचकारी ने बंद
राह अब खोली।
छायी कान्हा की
बृज में रंगोली।
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