ख़ुशी आयी
ख़ुशी चली गयी
ख़ुशी आख़िर
ठहरती क्यों नहीं ?
आँख की चमक
मनमोहक हुई
कुछ देर के लिये
फिर वही
रूखा रुआँसापन
ग़म आता है
जगह बनाता है
ठहर जाता है
बेशर्मी से
ज़िन्दगी को
बोझिल बनाने
भारी क़दमों से
दुरूह सफ़र
तय करने के लिये
ख़ुशी और ग़म का
अभीष्ट अनुपात
तय करते-करते
एक जीवन बीत जाता है
अमृत-घट रीत जाता है।
© रवीन्द्र सिंह यादव