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मंगलवार, 11 अगस्त 2026

छलनी

आओ

आशाओं को 

महीन छलनी में 

रखकर देखते हैं 

और फिर 

छलनी को 

हौले-हौले 

रीतते हुए देखते हैं

बस देखना है 

आशाएँ 

औंधे मुँह तो नहीं गिरीं

या कोई 

सुगबुगाहट तो नहीं हुई। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 

 

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

आशा कभी नहीं मरती

आशा जन्म लेती है स्वप्निल स्वर्णिम सुखी आकाश-सा कैनवास लिए जुड़ जाती है नवजात के साथ जन्म से तीव्र हो उठती है किशोर वय में युवाओं में चहकती है / फुदकती है सुरमई लय में न जलती है न दफ़्न होती है बुढ़ापे की अंतिम सांस के स्थिर होने पर कमज़ोर नहीं पड़ती जाऱ-ज़ार रोने पर सुखकारी परिवर्तन की आशा कभी नहीं मरती इंसान में भटकाव के भंवर से उबरने की आशा कभी नहीं मरती आशा बनी रहेगी बेहतर संसार के लिए फूल खिलते रहेंगे भंवरों-तितलियों के अनंत अतुलित प्यार के लिए।
©रवीन्द्र सिंह यादव  

शनिवार, 12 नवंबर 2016

आशा


उन मासूमों के माता-पिता

आल्हादित थे

रेत के कलात्मक  घरौंदे  देखकर

जो नन्हे हाथों ने चटपट लगन से बनाए थे

हौसलों  की  उन्मुक्त उड़ान  

फूल और पत्तियों से  सजाए थे।


बच्चों का रचनात्मक श्रम 

औरों को भी आकर्षित कर रहा था  

कुछ  और  बच्चे  आए 

जुट  गए उमंगोल्लास से घरौंदा बनाने

मनोहारी शांत नदी का किनारा

ख़ुशनुमा माहौल से चहक रहा था

पक्षियों का कलरव मोहक हो 

आसमान में गूँज रहा था।


अचानक तेज़ हवा बही

नदी का जल

लहरों की शक्ल में

किनारे की ओर उमड़ा

पलभर में नज़ारा बदल गया

मुरझा गए सुकोमल मासूम चेहरे

श्रम ने जो शब्द सृजित किए थे

वे ख़ामोश हो गये थे...!

माता-पिता आशावाद का
 
नीरस-सरस पाठ पढ़ाते हुए

नन्हे-मुन्ने छौनों के 

आँसू पौंछते 

घर लौट आए...!!

#रवीन्द्र_सिंह_यादव 

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