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सोमवार, 19 अगस्त 2019

नीड़


निर्माण न्यारे नीड़ का 

नित-नित  करती, 


वह नन्ही चिड़िया 


जोखिमभरी ज़िद करती। 


बस्तियाँ ही बस्तियाँ हैं 


तिनके अब 

बहुत दूर-दूर मिलते,


वृक्ष रोपने निकले  

आवारा राही के 


नक़्श-ए-क़दम नहीं मिलते।


ख़ामोशियों में डूबी 


चिड़िया उदास नहीं, 


भले ही दरिया-ए-ग़म का 


किनारा भी अब पास नहीं। 


गुज़रना है ख़ामोशी से 

दिल में ख़लिश 

ता-उम्र सब्र का साथ लिए, 


फल की चिंता किए बग़ैर

कर्मरत है चिड़िया  

ख़ुद से जीने का समझौता किए। 

शजर की शाख़ पर 

हालात से लड़कर 


संजोया है प्यारा नशेमन 

कुछ लम्हात के लिए,

हालात की आँधी में  

पालना है पीढ़ी को 


हो क़ाबिल ऊँची उड़ान के लिये।  


© रवीन्द्र सिंह यादव 


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