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गुरुवार, 1 मई 2025

वक़्त और काया

बादलों की प्रतीक्षा में 

अनिमेष अनवरत ताकते हुए 

वृक्ष में क्या परिवर्तित हुआ?

ऋतुओं का संधिकाल आते-आते 

सूख गए हरित-पीत पत्ते, 

कुम्हलाए कोमल किसलय 

मुरझा गए सुकोमल सुमनालय

व्याकुलता बढ़ती रही छाल की  

काया क्षीण हुई विशाल वृक्ष की 

वक़्त का क्या गया 

बस स्मृतियों का ख़ज़ाना बढ़ गया

एक वार्षिक वलय और बढ़ गया 

मिला कोई घट गया 

पानी हवा से हट गया

लू के थपेड़े झेलकर 

गुलमोहर खिल उठा 

विपरीत मौसम में 

कौन किससे रूठा?  

©रवीन्द्र सिंह यादव 

 

रविवार, 26 अप्रैल 2020

इतिहास

इतिहास पढ़ा 

ज़्यादातर ब्यौरा 

सत्ता के 

उत्थान और पतन का

सत्ता और संपत्ति के 

हस्तांतरण का 

अमीरों की जीवनशैली 

दर्शन,कलाप्रियता,क्रूरता 

और चरित्र के क़िस्से

सामाजिक राजनीतिक वातावरण के 

पुख़्ता दस्तावेज़ 

सभ्यता-संस्कृति के बीज-वृक्ष 

कुछ शासकों की नीतियाँ 

उत्पन्न करतीं खीझ 

बहुत कुछ 

दर्ज होने से छूट गया है 

ऐसा पुरखे बताते रहे  

समृद्ध इतिहास पर गर्व है 

यह तो पुरखों की की देन है 

हमारा किया-धरा 

भावी पीढ़ियाँ पढेंगीं

मजबूरन भुगतेंगीं  

सराहेंगीं या धिक्कारेंगीं 

वक़्त तय करेगा। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

ख़िज़ाँ ने फिर अपना रुख़ क्यों मोड़ा है?




मिटकर मेहंदी को

रचते सबने देखा है,

उजड़कर मोहब्बत को

रंग लाते देखा है?


चमन में बहारों का

बस वक़्त थोड़ा है,

ख़िज़ाँ ने फिर अपना

रुख़ क्यों मोड़ा है?


ज़माने के सितम से

न छूटता दामन है,

जुदाई से बड़ा

भला कोई इम्तिहान है?


मज़बूरी के दायरों में

हसरतें दिन-रात पलीं,

मचलती उम्मीदें

कब क़दम मिलाकर चलीं? 


दुनिया में वफ़ा की आबरू है

साथ ख़ौफ़-ए-जफ़ा है,

ज़मीं-आसमां किसी बेआसरा से

क्यों इतना ख़फ़ा हैं?

© रवीन्द्र सिंह यादव

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

वक़्त



एक शिल्पी है वक़्त 

गढ़ता है दिन-रात

उकेरता अद्भुत नक़्क़ाशी 

बिखेरता रंग लिये बहुरँगी कूची  

पलछिन पहर हैं पाँखुरियाँ 

बजतीं सुरीली बाँसुरियाँ 

सृजित करता है 

स्याह-उज्ज्वळ इतिहास 

पल-पल परिवर्तित प्रकृति 

घड़ियाँ करतीं परिहास  

नसीम-सा गुज़रता है 

हर्ष-विषाद के पड़ावों से 

मरहम हो जाता है 

आप्लावित होता है भावों से 

उजलत मानव अभिलाषा 

कोसती है वक़्त को 

ख़ुद ठहरकर 

सुबह-शाम 

दोष देती वक़्त को  

वक़्त की गर्दिश को 

सीने से लगा लेते हैं हम 

ठोकरें और थपेड़े वक़्त के 

ज़ेहन में क्यों सजा लेते हैं हम ?

© रवीन्द्र सिंह यादव


उजलत = उतावली,व्यग्र 

नसीम = जो दूसरों की सहायता करता हो  

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

अश्क का रुपहला धुआँ

बीते वक़्त की

एक मौज लौट आयी, 

आपकी हथेलियों पर रची

हिना फिर खिलखिलायी। 


मेरे हाथ पर 

अपनी हथेली रखकर 

दिखाये थे 

हिना  के  ख़ूबसूरत  रंग, 

बज उठा था 

ह्रदय में 

अरमानों का जलतरंग।


छायी दिल-ओ-दिमाग़ पर 

कुछ इस तरह 

भीनी-भीनी महक-ए-हिना, 

सारे तकल्लुफ़ परे रख 

ज़ेहन ने 

तेज़ धड़कनों को 

बार-बार गिना।   


अदृश्य हुआ 

रेखाओं का 

ताना-बाना बुनता 

क़ुदरत का जाल,

हथेली पर 

बिखेर दिया 

हिना ने अपना 

रंगभरा इंद्रजाल। 


शोख़ निगाह 

दूर-दूर तक गयी, 

स्वप्निल अर्थों के 

रंगीन ख़्वाब लेकर 

लौट आयी। 


लबों पर तिरती मुस्कुराहट  

उतर गयी दिल की गहराइयों में, 

गुज़रने लगी तस्वीर-ए-तसव्वुर 

एहसासात की अंगड़ाइयों में। 


एक मोती उठाया 

ह्रदय तल  की गहराइयों से, 

आरज़ू के जाल में उलझाया 

उर्मिल ऊर्जा की लहरियों से। 


उठा ऊपर

आँख से टपका 

गिरा...

रंग-ए-हिना से सजी 

ख़ूबसूरत हथेली पर, 

उभरा अक्स उसमें 

फिर उमड़ा 

अश्क  का रुपहला धुआँ 

लगा ज्यों 

चाँद उतर आया हो 

ज़मीं  पर...! 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...