सरसों लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सरसों लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 20 फ़रवरी 2023

बसंत तुम फिर चले जाओगे



शिशिर ने बसंत को सौंपी थीं  

मौसम की मासूम धड़कनें

अवनि-अंबर में छट गईं 

कोहरे की क़ाएम अड़चनें 

फाल्गुन, चैत्र महीने 

खेत-खलिहान, किसान 

महकती मोहक बयार 

हृदय में रचने लगे सृजन 

गेहूँ-जौ की सुनहरी बालियाँ 

गीत गातीं विहंग-वृंद बोलियाँ

आतुर हुए रंग-बिरंगे फूल-पत्तियाँ 

सजे सरसों के खेत और क्यारियाँ

गुनगुनी धूप समाई  

पुलकित-व्यथित अंतरमन की गहराइयों में 

कोकिला की कोमल कूक 

गूँजी सुदूर सघन अमराइयों में 

गीष्म की प्रताड़ना और पतझड़ का 

कल्पित भय दिखाकर 

बसंत तुम इस बार फिर चले जाओगे...

आस है कि तुम फिर चले आओगे।  

© रवीन्द्र सिंह यादव  


बुधवार, 13 जनवरी 2021

समझ अब देर तक राह भूली है


देख रहा है सारा आलम

खेतों में सरसों फूली है

ओस से भीगी शाख़ पर 

नन्ही चिड़िया झूली है 

परेड की चिंता न समिति की फ़िक्र

हँसिया के बियाह में खुरपी का ज़िक्र 

खेत के पहरेदारों संग अनशन में बैठे

सत्ता की नज़रों में वे गाजर-मूली हैं 

ख़ुद के कंधों पर ख़ुद को ढोना

उनसे सीख लो मगर-सा रोना

लज्जाहीन न समझेंगे अब वो 

दंभ में अक्ल राह अब भूली है।

© रवीन्द्र सिंह यादव

बुधवार, 31 जनवरी 2018

बसंत (हाइकु )







छाया बसंत 
है बसंत-बहार 
मुदित जिया 


महका बाग़ 
चहकी कली-कली 
कूकी कोयल 



बौराये आम 
फूली पीली सरसों 
हँसे किसान  

मस्त फ़ज़ाऐं 
गुनगुनी है धूप 
हरे शजर 

ढाक-पलाश 
सुर्ख़ हुआ जंगल 
महके फूल 







खिला बाग़ीचा 
फूलों पे चढ़ा रंग
रंगी है भोर

दिल की लगी 
यक़ीं-वफ़ा के गीत 
भाये मन को  

सूनी है साँझ
चंदा चुपचाप क्यों
रोया चकोर 

बुझते दिये 
मायूसियों के साये 
आ जाओ पिया 

# रवीन्द्र  सिंह यादव 


शुक्रवार, 10 मार्च 2017

आयी राम की अवध में होली



आयी   राम    की

अवध   में    होली ,

छायी  कान्हा  की

बृज    में   रंगोली।



पक   गयी  सरसों

बौराये    हैं   आम,

मनचलों  को  अब

सूझी   है  ठिठोली।

छायी   कान्हा  की


बृज    में   रंगोली।



भाये       मन      को

रंग    अबीर   गुलाल ,

मस्ताने    बसंत    में

कूक  कोयल   बोली।

छायी    कान्हा    की

बृज      में     रंगोली।





मिट     गये    मलाल

मलने     से   गुलाल,                                                                                                                                         
भरी मायूस मन  की

ख़ुशियों   ने   झोली।

छायी    कान्हा   की

बृज     में     रंगोली।













खेलो     होली    बन


राधा     नन्द - लाल ,


पिचकारी    ने    बंद


राह    अब     खोली।


छायी     कान्हा   की


बृज      में      रंगोली।




@रवीन्द्र  सिंह यादव


इस रचना  का यू-ट्यूब पर  (चैनल - MERE SHABD--SWAR) लिंक -https://youtu.be/ufs7srNvtAU

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

आया ऋतुराज बसंत




शिशिर   का    प्रकोप    ढलान   पर

आया  ऋतुराज  बसंत  दालान  पर

खेत-खलिहान  / बाग़-बग़ीचे

पीलिमा-लालिमा / हरीतिमा  का  सुरभित  आभामंडल,

आहिस्ता-आहिस्ता कपड़े सुखाती गुनगुनी  धूप

पुष्प-पत्तों  दूब-नलिका  ने  पहने  ओस  के  कुंडल।

सरसों    के    पीले    फूल

गेंहूँ-जौ   की  नवोदित  बालियाँ / दहकते  ढाक-पलाश,

आम्र-मंजरियों के सुनहले गर्वीले गुच्छ 

सृष्टि  का  सरस  सामीप्य  साकार सौंदर्य

मोहक  हो  पूरी  करता  मन  की  तलाश।

पक्षियों  का  कर्णप्रिय  कलरव,  

मानो  गा  रहा   कोई

रसमय राग  भैरव।


आ   गया   बसंत

अल्हड़  मन  पर  छा  गया  बसंत,

प्रकृति  के  प्रवाह   में

होता  नहीं   कोमा  या  हलंत।  


उत्सव   मनाओ  क़ुदरती  मेलों  में

  जीओ  सजीव  सार्थक  बसंत,  

पोस्टर, कलेंडर, फिल्मांकन, अंतरजाल  में

हम  ढूँढ़ते  हैं  आभासी  अनमना निर्जीव  बसंत।

@रवीन्द्र  सिंह यादव
 
                         






रवीन्द्र  सिंह यादव

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...