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शनिवार, 8 अगस्त 2026

वह जेन ज़ी नहीं जेन अल्फा भारत की बेटी...

 

आक्रोश आवेश में थी वह भारत की बेटी 

देखकर पुलिस की क्रूर बर्बरता 
निहत्थे अहिंसक आंदोलनकारियों /महिलाओं पर 
पंद्रह वर्ष आयु पाने से नौ दिवस पूर्व 
दे आयी थी गाली प्रधानमंत्री को जंतर-मंतर पर 
पहचान उजागर कर दी 
डिजिटल हिंसा के ठेकेदारों ने 
एक स्त्री ही खड़ी हो गयी 
उस बेटी को क़ानूनी सबक़ सिखाने को 
धँसे गले से नज़र झुकाये आयी वीडिओ में 
सिटपिटाई-सी सार्वजनिक माफ़ी माँगने को
आत्मग्लानि से भर गया समूचा देश
देख क्रूर अट्टहास का वीभत्स परिवेश
विकृत राजनीति के समक्ष विवश-लाचार हुई प्रबुद्ध मानवता
माँ-बेटी स्वयं लड़ीं दहशत-घृणा से, दबाये भाव-विह्वलता
भीड़-तंत्र के न हो हवाले हमारा प्यारा देश
शराफ़त अब और न रहो अपाहिज-ख़ामोश!

©रवीन्द्र सिंह यादव 


शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

किसको क्या मिला?


 तुच्छताओं को 

स्थाई स्थान ढूँढ़ना था 

तो राजनीति में समा गईं

हताशाओं को 

तलाश थी मुकम्मल ठिकाने की 

तो कापुरुष में समा गईं

चतुराई चपला-सी चंचल 

भविष्य बनाने निकली 

तो बाज़ारों की रौनक में बस गई 

जीने की चाह 

भटकती रही 

सन्नाटोंभरे खंडहरों में 

लड़खड़ाकर गिरने से पहले 

सँभल गई

मानवता पूँजी के अत्याचार झेलते-झेलते 

क्षत-विक्षत होकर ख़ुद से आश्वस्त हुई 

तो विचार-क्रांति के साथ कोहरे को चीरती चली गई।

© रवीन्द्र सिंह यादव


सोमवार, 29 जुलाई 2019

क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर






















दिनकर की धूप पाकर 

भोजन बनाता है पेड़ दिनभर,

लक्ष्यहीन अतरंगित असम्पृक्त को 

   भटकन से उबारता है पेड़ दिनभर।  


चतुर्दिक फैली ज़हरीली हवा 

निगलता है पेड़ दिनभर, 

मुफ़्त मयस्सर प्राणवायु 

उगलता है पेड़ दिनभर। 


नीले शून्य में बादलों को 

दिलभर रिझाता है पेड़ दिनभर, 

आते-जाते थके-हारे परिंदों को 

बुलाता है पेड़ दिनभर।



कलरव की प्यारी सरगम 

उदासी में सुनता है पेड़ दिनभर, 

आदमी को अपनी नज़रों में 

उठता-गिरता देखता है पेड़ दिनभर।  


यूनिवर्सिटी में रिसर्च का 

विषय बनता पेड़ दिनभर, 

राजनीति के हाथों सजीले गड्ढे में 

रोपा जाता पेड़ दिनभर। 


पथिक को ठंडी हवा के झौंकों से 

दुलराता पेड़ दिनभर, 

साधनविहीन पाठशाला का 

आसरा बनता पेड़ दिनभर। 


बाग़बान को सुख-चैन की 

रागिनी सुनाता पेड़ दिनभर, 

कलाकारों की साधना का 

आयाम बनता पेड़ दिनभर। 


निर्विवाद इतिहास 

रचता है पेड़ दिनभर,

भौतिकता के अलबेले दौर का 

मज़ाक़ उड़ाता पेड़ दिनभर। 


फलों का भार लादे लचकदार होकर 

जीना सिखाता पेड़ दिनभर, 

पढ़ने जाती नन्हीं मुनिया को 

बढ़ते हुए देखता पेड़ दिनभर। 


खेतों में पसीना बहाते मेहनतकशों को 

मिलीं गालियाँ सुनता पेड़ दिनभर,

सबूत मिटाकर सफ़ेदपोश बने 

अपराधी के अपराध गिनता है पेड़ दिनभर। 


क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर... 

सारे भले कार्य करता है पेड़ दिनभर,

मरकर भी हमारा पेट भर जाता है शजर  

फिर क्यों काटा जाता है पेड़ दिनभर ? 

© रवीन्द्र सिंह यादव 




रविवार, 7 अक्टूबर 2018

काला झंडा



समाचार  आ  रहे  हैं-

"काले रंग से भयभीत हैं सत्ताधारी नेता" 

ब्रह्माण्ड की रचना में 

है सत्त्व, रज और तम 

गुणों की प्रधानता, 

सृष्टि के समस्त रंगों को 

सोख  लेने की 

 है काले रंग में क्षमता। 


प्रतिशोध-विरोध

द्वंद्व  विमुखता

नकारात्मक स्पंदन 

अपारदर्शिता कलुषित विचार 

अब मान लिए गए हैं काले रंग की पहचान,

बुरी नज़र से बचाने 

बचपन में माँ माथे पर 

लगा देती थी 

नन्हा काला निशान। 


सृष्टि में समाहित 

नाना प्रकृति की ऊष्मा 

अवशोषित करता सारी,

काले रंग में समाकर  

परावर्तन से रहती हारी। 


सबरंग मिलें 

तो बन जाय काला, 

रहता वहाँ काला अँधेरा   

पहुँच न पाया 

जहाँ श्वेताभ  उजाला।  


राम श्याम 

शिव शनि  

माँ काली, 

भाये सबको 

हुआ न कोई सवाली। 


श्याम-पटल पर 

सुलझाते अध्यापक 

जीवन के विकट सवाल,

जीवन में आती हैं ख़ुशियाँ  

काली रात के चंगुल से 

होती जब रौशनी बहाल।  


काला रंग ही 

साबित हुआ 

अब तक औरों से महान, 

मत कहना

न लिखना 

किसी  व्यक्ति को काला 

अंतरराष्ट्रीय क़ानून को लेना जान। 


काली करतूत 

काले कारनामे 

काला कारोबार 

काला धन

काला धब्बा  

काला मुँह

काला टीका  

कोयले की दलाली में हाथ काले

काजल की कोठरी   

बन गये

अब चर्चा के अंग, 

करके काले कर्म 

लोग करते 

समाज बदरंग। 


थर-थर काँप रहे हैं नेता

क्रोधित भीड़ में  

देखकर काला झंडा, 

जो लहराये काला झंडा  

पुलिस चलाती जमकर 

उसपर सरकारी  डंडा।
  

सभा में आते लोगों की 

अब होती ख़ाना-तलाशी, 

काले रंग के 

अन्तःवसन

रुमाल

बेल्ट

या मोज़े भी   

हैं प्रतिबंधित 

सुनो भाषण-अभिलाषी। 


शरारती तत्वों ने 

खोज लिया है  

काले झंडे का उपाय, 

नेताओं की सभा में 

नारा लिखकर 

काला  गुब्बारा 

अब देते हवा में 

ऊँचा उड़ाय। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

झाड़ू





बुज़ुर्गों ने समझाया था 

रात में झाड़ू मत लगाना 

घर से लक्ष्मी चली जायेगी  

सच कहा था 

बिजली से पहले का ज़माना

था ऐसा मानना 

अँधेरे-उजाले धुँधलके में   

कचरे के साथ 

क़ीमती चीज़ भी जायेगी 



आजकल 

लम्बे डंडे में बँधी झाड़ू 

विख्यात हो गयी है 

सेलिब्रिटी की नाज़ुक 

हथेलियों में जो गयी है


कई जाँचों से

गुज़रकर

निरापद होकर  

आगे बढ़ती है झाड़ू 

पकड़ते हैं इसे 

कैमरे के सामने 

नेता-अभिनेता जुगाड़ू 


नक़ली कचरा 

मँगवाया जाता है 

साफ़ जगह को 

गन्दा दिखाया जाता है 

कमाल के 

ढीठ सफ़ाईकर्मी हैं 

हमारे देश में 

वीवीआईपी के आने की 

पूर्व सूचना पर भी  

नियत स्थान को 

साहब के कहने पर 

साफ़ करके 

गन्दा दिखने हेतु 

प्री-ट्रीटेड कचरा फैलाते हैं


नाटकीयता से विरत 

जो हैं 

सुर्ख़ियों से परे  

सफ़ाई कार्य में 

अनवरत अनुरक्त

उन्हें

मेरा

सादर नमन

मिले उन्हें 

यथोचित सम्मान
   


बापू की स्मृति को 

चिरस्थायी बनाने हेतु 

 चश्मे पर 

लिख दिया है

"स्वच्छ भारत"

ज़रूरी है-  

दिमाग़ी  कचरा साफ़ हो 

साफ़ नियत-नीति की बात हो 

ख़ज़ाने की सफ़ाई में जुटे

लुटेरों पर लग़ाम हो 

सीवर-सफ़ाई का 

आधुनिक इंतज़ाम हो 

दिखेगा तब 

स्वच्छ भारत !

समृद्ध भारत !!

ज़रा सोचिये! 

अभी 

कैसा दिख रहा होगा..... 

अदृश्य बापू को 

अपने चश्मे से 

आज का भारत....???  

© रवीन्द्र सिंह यादव


रविवार, 23 सितंबर 2018

चिड़िया


चिड़िया हाँफती हुई 

घोंसले में दाख़िल हुई 

चोंच में दबाए चुग्गा 

बच्चों को खिलाया

हालात नाज़ुक हैं 

 बसेरे के आसपास 

टीवी पर 

समाचार देख रहे 

नन्हे बच्चों ने 

चिड़िया को बताया। 


मोबोक्रेसी के 

भयावह परिवेश में 

माँ कितनी रिस्क लेकर 

चुग्गा लेने जाती हो

चिड़ीमार गिरोहों से 

ख़ुद को 

कैसे बचाकर लौटती हो?


खेतों में उगनेवाले 

अन्न के दानों पर 

उपयोगितावादी मनुष्य 

केवल अपना 

अधिकार समझ बैठा है

अब नई-नई  

तरकीबों के साथ 

चिड़ियों को उड़ाने नहीं 

जान से मारने हेतु 

प्रकृति से उलझ बैठा है। 


स्वार्थ का समुंदर  

दिनोंदिन 

रातोंरात 

गहरा हो चला है

शयनरत शाख़ पर 

मासूम चिड़िया 

मारी जा रही है 

जैसे कोई 

अहर्निश सताती बला हो।

© रवीन्द्र सिंह यादव   


बुधवार, 19 सितंबर 2018

हो सके तो मुझे माफ़ करना नम्बी!


समाचार आया है -
"इसरो के वैज्ञानिक को मिला 24 साल बाद न्याय"

न्याय के लिये दुरूह संघर्ष 

नम्बी नारायण लड़ते रहे चौबीस वर्ष 

इसरो जासूसी-काण्ड में 

पचास दिन जेल में रहे 

पुलिसिया यातनाओं के 

थर्ड डिग्री टॉर्चर भी सहे 

सत्ता और सियासत के खेल में 

प्रोफ़ेसर नम्बी पहुँचे सलाख़ों के पीछे 

क्रायोजेनिक इंजिन 

विकसित करने की दौड़ में 

देश चला गया वर्षों पीछे


1994 में ख़बर पढ़कर 

मेरा भी मन खिन्न हुआ था 

मीडिया के लिये वैज्ञानिक 

सनसनी का जिन्न हुआ था 

मीडिया का चरित्र  

प्रचार-प्रसार से जुड़ा है 

चरित्र हनन  से भी 

इसकी तिजोरी में पैसा जुड़ा है 

मीडिया ने 1994 में 

महान तन्मयता दिखाई थी 

2018 में अब क्यों है 

हालत खिसियाई-सी 

मैंने भी आपको 

तब गद्दार, देशद्रोही,लालची  

और जाने क्या-क्या समझा था 

काश! मीडिया आज 

उन सबको सच  बताता 

जिन्होंने वैज्ञानिक  को 

ग़लत समझा था

जाने कितने देशवासी 

ग़लतफ़हमी लिये 

स्वर्ग सिधार गये 

उनके अपने  कलंक की कालख 

धोते-धोते 

जीवनबोध का मर्म  हार गये   



जासूसी के आरोप लगे 1994 में

सीबीआई ने क्लीन चिट दी 1996 में 

सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया 1998 में 

मान-प्रतिष्ठा बहाली, मुआवज़े की

लम्बी लड़ाई का अंत 2018 में 



सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर

साज़िश की  जाँच होगी 

सम्बंधित अधिकारियों से 

50 लाख रुपये की बसूली होगी 

हम देखेंगे 

वैज्ञानिक प्रतिभा की 

हत्या की बात 

किसने अपने सर ली होगी 

स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजिन 

विकसित करने में हुई देरी से 

देश को हुई क्षति की 

भरपाई करेगा कौन 

विदेशी हाथ होने के 

ज़िक्र पर सब रहेंगे मौन 



क्रायोजेनिक इंजन 

टेक्नोलॉजी-ट्रांसफ़र समझौता 

हुआ 1992 में भारत-रूस के साथ 

अमेरिका ने धमकाया था 

बदहाल रूस को 

ख़ैरात के एहसान और 

एकध्रुवीय महाशक्ति 

होने के रसूख़ के साथ 

ज़रूरतमंद रूस ने 

क्रायोजेनिक तकनीक का 

समझौता किया था 

235 करोड़ रुपये में 

फ़्रांस तैयार था 

650 करोड़ रुपये में 

चतुर व्यापारी अमेरिका 

देना चाहता था 

950 करोड़ रुपये में 

दवाब में रूस ने 

पाँव पीछे खींचे 

सौदे के पर खींचे 

नम्बी नारायण ने 

स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन 

विकसित करने के 

तब ख़ाके खींचे 

5 जनवरी 2014 को 

क्रायोजेनिक इंजन का 

परीक्षण भारत में सफल हुआ 

अपना उल्लेख ख़बरों में  पाकर 

एक वैज्ञानिक भाव विह्वल हुआ   



एक वैज्ञानिक को 

इंसाफ़ मिलने में 

सदी का एक चौथाई 

समय ख़र्च होता है 

ग़रीब नागरिक तो 

ज़िंदगीभर इंसाफ़ के लिये 

एड़ियाँ रगड़ते हुए 

लाचारी का बोझ ढोता है 




हो सके तो 

मुझे माफ़ करना नम्बी

मेरा नाम भी 

उन गुनाहगारों की 

लम्बी फ़ेहरिस्त में शामिल है  

जो आपको 1994 में 

जी भरकर कोस रहे थे 

आपके भारतीय नागरिक होने पर 

मन भर मन मसोस रहे थे......... ! 



आपको सादर नमन नम्बी!  

जो आपने वक़्त की बेरुख़ी 

और मानसिक वेदना को 

निताँत ख़ामोशी से सहा 

अपने भोले  देशवासियों को 

कुछ नहीं कहा!! 

"रेडी टू फ़ायर" ने हमसे 

दिल दहलाती दास्तान का दर्द  

शिद्दत से कहा है !!! 

© रवीन्द्र सिंह यादव

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