तुच्छताओं को
स्थाई स्थान ढूँढ़ना था
तो राजनीति में समा गईं
हताशाओं को
तलाश थी मुकम्मल ठिकाने की
तो कापुरुष में समा गईं
चतुराई चपला-सी चंचल
भविष्य बनाने निकली
तो बाज़ारों की रौनक में बस गई
जीने की चाह
भटकती रही
सन्नाटोंभरे खंडहरों में
लड़खड़ाकर गिरने से पहले
सँभल गई
मानवता पूँजी के अत्याचार झेलते-झेलते
क्षत-विक्षत होकर ख़ुद से आश्वस्त हुई
तो विचार-क्रांति के साथ कोहरे को चीरती चली गई।
© रवीन्द्र सिंह यादव
