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शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

किसको क्या मिला?


 तुच्छताओं को 

स्थाई स्थान ढूँढ़ना था 

तो राजनीति में समा गईं

हताशाओं को 

तलाश थी मुकम्मल ठिकाने की 

तो कापुरुष में समा गईं

चतुराई चपला-सी चंचल 

भविष्य बनाने निकली 

तो बाज़ारों की रौनक में बस गई 

जीने की चाह 

भटकती रही 

सन्नाटोंभरे खंडहरों में 

लड़खड़ाकर गिरने से पहले 

सँभल गई

मानवता पूँजी के अत्याचार झेलते-झेलते 

क्षत-विक्षत होकर ख़ुद से आश्वस्त हुई 

तो विचार-क्रांति के साथ कोहरे को चीरती चली गई।

© रवीन्द्र सिंह यादव


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