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गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

इश्क़ की दुनिया में ....


इश्क़ की दुनिया में

ढलते-ढलते रुक जाती है रात

हुक़ूमत दिल पर करते हैं जज़्बात

ज़ुल्फ़ के साये में होती  है शाम

साहब-ए-यार  के  कूचे से गुज़रे  तो हुए बदनाम

साथ निभाने का पयाम

वफ़ा का हसीं पैग़ाम

आँख हो जाती है जुबां हाल-ए-दिल सुनाने को

क़ुर्बान होती है शमा जलकर रौशनी फैलाने को

चराग़ जलते हैं आंधी में 

आग लग जाती है पानी में

आये महबूब तो आती है बहार

उसकी महक से महकते हैं घर-बार

सितारे उतर आते हैं ज़मीं पर

होते हैं ज़ुल्म-ओ-सितम सर-आँखों पर   

गुमां-ए-फंतासी में डूबा दिल

कहता है बहककर -

थम जा ऐ वक़्त !

बहुत प्यासा है दिल मोहब्बत का

अफ़सोस ! निष्ठुर है वक़्त

मारकर ठोकर इस याचना को

आगे बढ़ता रहता है

हमेशा की तरह..... 

#रवीन्द्र  सिंह यादव

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

चाँद पूनम का


कभी भूलती नहीं ये लगती बड़ी सुहानी,
चंदा सुनेगा आज फिर मेरी वही कहानी।
दोहराता है ये मन
है अजीब-सी लगन
पूनम की रात आयी
नूर-ए-चश्म लायी
हसीं चंदा ने 
बसुंधरा पर 
धवल चाँदनी बिखरायी 
चमन-चमन खिला था
 मौसम-ए-बहार  का 
प्यारा-सा सिलसिला था
कली-कली पर शोख़ियाँ 
और शबाब ग़ज़ब खिला था
 एक सरल  सुकुमार कली से 
आवारा यायावर भ्रमर मनुहार से मिला था
हवा का रुख़ प्यारा बहुत नरम था
दिशाओं का न कोई अब भरम था  
राग-द्वेष भूले
बहार में सब झूले 
फ़ज़ाओं में भीनी महकार थी 
दिलों में एकाकार की पुकार थी  
शहनाइयों की धुन कानों में बज रही थी
चाह-ए-इज़हार  बार-बार मचल रही थी
ज़ुल्फ़-ए-चाँद को संवारा
कहा दिल का हाल सारा
नज़र उठाकर उसने देखा था 
चंदा को आसमान में
लगा था जैसे रह गया हो 
उलझकर तीर एक कमान में 
 फिर झुकी नज़र से उसने 
घास के पत्ते को था सहलाया
छलक पड़े थे आँसू 
ख़ुद को बहुत रुलाया
इक़रार पर अब यकीं था आया
था इश्क़ का बढ़ चला सरमाया
नज़रें  मिलीं तो  पाया
चाँद को ढक  रही  थी
बदली की घनी छाया
पानी में दिख रही थी 
        लरज़ते चाँद की प्रतिछाया... 
नील गगन में चंदा आयेगा बार-बार  
 शिकवे-गिले सुनेगा आशिक़ों की ज़ुबानी,
चंदा सुनेगा आज फिर मेरी वही कहानी।

#रवीन्द्र सिंह यादव  

इस रचना को सस्वर सुनने के लिए YouTube Link-
https://youtu.be/7aBVofXYnN0

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