धुंध में धूमिल हैं दिशाएँ
सीखे-पढ़े को क्या सिखाएँ
विकराल विध्वंस की सामर्थ्य
समाई उँगलियों में
सघन कुहाँसे से
फिर-फिर लड़ा जाएगा
रवि रोपता जा रहा है विचार
अपनी उज्जवल रश्मियों में
भीड़ के जयकारे
उत्साह उमंग नहीं
व्यस्त हैं भय उगलने में
रौंद डालने को आतुर है
तुम्हारा स्थान
केन्द्र हो या हाशिए
भीड़ को तो बस इशारा चाहिए!
© रवीन्द्र सिंह यादव