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शुक्रवार, 29 सितंबर 2023

मदद के लिए गुहार आठ किलोमीटर!

चीख़ती चलती चली गई 

वह किशोरी 

माँगती हुई मदद दर-दर दर्द से कराहती 

पैदल भागती आठ किलोमीटर

उज्जैन का वह पथ 

थी ख़ून से लथपथ 

वह बलात्कार पीड़िता

हाय! फुक गया है 

समाज की संवेदना का मीटर 

एक नेक युवा पुजारी ने 

अनेक किंतु-परंतुओं को 

विराम देते हुए 

पीड़िता की मदद की

खींची लकीर इंसानियत की 

गुफाओं से निकलकर 

भव्य अट्टालिकाओं में आ बसा

आधुनिक स्वार्थी समाज 

संवेदना को मारकर

आज कितना सभ्य हुआ है?

सामाजिक मूल्यों का कैनवास

कितना भव्य हुआ है?

अफ़सोस!

हमारी गुफा में अंधकार

अब और गहरा गया है

हमारे अंतस में घृणा को

किरायेदार बनाकर कोई ठहरा गया है!

©रवीन्द्र सिंह यादव 

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

रंजिशों के साथ

सपनों की 

भव्य अट्टालिकाओं को 

ढह जाना होता है

नयनों में उमड़े 

दर्दीले आँसुओं को 

बस बह जाना होता है

उपवन के सौंदर्य में लवलीन

रसिक मन को 

काँटों का चुभना 

सह जाना होता है

चन्द्रिका बिखर जाती है 

अँधेरी राहों को 

रौशन करने 

तब 

जुगनुओं के दिल को 

रंजिशों के साथ 

कृष्णपक्ष तक 

चुप रह जाना होता है।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

    

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

विटामिन डी ( वर्ण पिरामिड )

ये
धूप
रोकती
अट्टालिका
सहते     हुए
हड्डियों का दर्द
कोसते धूप-बाधा।



रोको
सौगात
क़ुदरती
भास्कर देता
निदाघ निर्बाध
विटामिन डी मुफ़्त।



हो
गया
शहरी
सिटीज़न
छाँव का आदी
घाम के दर्शन
हैं सुकून की वादी। 


है
धूप
गायब
तहख़ाने
हाट-बाज़ार
दवाई-दवाई
जेब ख़ूब चिल्लाई।  


लो 
घुटा  
इंसान 
अभिव्यक्ति 
तलाशती     है 
छायावादी  युग 
प्रगति के सोपान। 

ये 
पौधे 
पोषित 
पल्लवित  
पंछी उड़ान 
प्यारा कलरव
धूप का ही साम्राज्य।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

निदाघ = गर्मी, ताप, धूप 



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