येधूप
रोकती
अट्टालिका
सहते हुए
हड्डियों का दर्द
कोसते धूप-बाधा।

न
रोको
सौगात
क़ुदरती
भास्कर देता
निदाघ निर्बाध
विटामिन डी मुफ़्त।
हो
गया
शहरी
सिटीज़न
छाँव का आदी
घाम के दर्शन
हैं सुकून की वादी।
है
धूप
गायब
तहख़ाने
हाट-बाज़ार
दवाई-दवाई
जेब ख़ूब चिल्लाई।
लो
घुटा
इंसान
अभिव्यक्ति
तलाशती है
छायावादी युग
प्रगति के सोपान।
ये
पौधे
पोषित
पल्लवित
पंछी उड़ान
प्यारा कलरव
धूप का ही साम्राज्य।
© रवीन्द्र सिंह यादव
निदाघ = गर्मी, ताप, धूप


