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रविवार, 11 जनवरी 2026

मानव और प्रकृति

चित्र:महेन्द्र सिंह 

तुम भला क्यों अजनबी हो जाना चाहते हो?

एक मौसम-चक्र परिपूर्ण होते-होते 

कितना कुछ है जो बदल जाता है प्रकृति में 

कली से फूल 

फूल में बीज 

बीजों से फिर नये पौधे 

देखो राह की मिट्टी को 

वर्षा में घुल गयी 

महक बिखेरकर धुल गयी 

हो जब सर्द मौसम की सुहानी धूप 

पर्वतों पर प्रकृति सँवारती है रूप 

नियति-क्रम में हरेक पल 

एक-दूसरे से अजनबी ही तो है...

प्रकृति की सर्वोत्तम कृति 

यानी मानव 

माप-गिन रहा है दूरी,दोष,समय,सामान

व्याकुल है कि लोग कैसे रहें परेशान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 


शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

सर्दी

 

चित्र:महेन्द्र सिंह 

सर्दी तुम हो बलवान 

कल-कल करती नदी का प्रवाह 

रोकने भर की है तुम में जान

जम जाती है बहती नदी 

बर्फ़ीली हवाओं को तीखा बनाने 

आती हो निरीह को सहना सिखाने  

तुम जब कोहरे के पंख लेकर 

उतरती हो धरा पर 

दृष्टि क्षमता घट जाती है जीव की

चिड़िया भी उड़ नहीं पाती पर पसार कर   

अदृश्य हो जाते हैं भानु,शशि और सितारे

भौतिक जीवन चलता है तकनीक के सहारे 

एक ह्रदय है 

धड़-धड़ धड़कता रहता है जीवनभर अनवरत 

जमने नहीं देता धमनियों-शिराओं में बहता रक्त

इसके भी अपने मौसम हैं 

अंगों के सह-अस्तित्त्व को सहेजे  

कुछ मनचीते 

कुछ बोझिल-से!    

©रवीन्द्र सिंह यादव




शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

भेड़ की ऊन

चित्र: महेन्द्र सिंह 

मासूम भेड़ की ऊन 

आधुनिक मशीनों से 

उतारी जा रही है

भेड़ की असहमति 

ठुकराई जा रही है

ज़बरन छीना जा रहा है   

सौम्य कोमल क़ुदरती कवच

है कैसा इंसानी बुद्धिमत्ता का सच   

तौहीन सहते-सहते 

गुज़ारेगी ठंड का मौसम 

कोसते काँपते-ठिठुरते हुए

कोई लुत्फ़ उठा रहा होगा

सर्दी के मौसम में इच्छित उष्णता का  

ऊनी रज़ाई ओढ़ते हुए!

 ©रवीन्द्र सिंह यादव

 

शुक्रवार, 4 मई 2018

बैसाख में मौसम बेईमान





कहीं बादल रहे उमड़
कहीं आँधी रही घुमड़
अब आ गयी धूप 
चुभती चिलचिलाती
अब सूखे कंठ से 
चिड़िया गीत न गाती


कोयल को तो मिल गया 
आमों से लकदक  बाग़
कौआ ढूँढ़ रहा है मटका 
गाता फिरे बेसुरा राग




चैतभर काटी फ़सल  
बैसाख में खलिहान 
आसमान को ताकता 
बेबस निरीह किसान 

बदला  रुख़  आसमान का 
आँधी-पानी का हो-हल्ला
उड़ जाता  भूसे का ढेर 
गीला होता सारा  गल्ला

आँधियाँ ले लेती हैं 
कितनों की जान 
क़ुदरत कब होगी मेहरबाँ?
कठिन दौर में होता अक़्सर
क्यों मौसम भी बेईमान ?
#रवीन्द्र सिंह यादव 

शब्दार्थ / WORD MEANINGS 
खलिहान = वह स्थान जहाँ फ़सल को काटकर एकत्र किया जाता है / BARN  
गल्ला = अनाज , अन्न / FOOD GRAINS 

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