यह सड़ाँध मारती
आब-ओ-हवा
भले ही
दम घोंटने पर
उतारू है,
पर अब करें भी
तो क्या करें
यही तो
हमसफ़र है
दुधारू है।
मिट्टी
पानी
हवा
वनस्पति से
सदियों पुरानी
तासीर चाहते हो,
रात के लकदक
उजालों में
टिमटिमाते
जुगनुओं को
पास बुलाकर
कभी पूछा-
"क्या चाहते हो?"
तल्ख़ियों से
भागते-भागते
आख़िर
हासिल क्या हुआ?
ख़र्चे दूर होकर भी
पास लगते हैं,
ये बेडौल
बेतरतीब
बेहिसाब
फैले शहरों के मंज़र
उदास लगते हैं।
फ़ख़्र अब तो
गाँव को भी
नहीं रहा
अपनी रुमानियत पर,
अब तो कौए भी
सवाल उठा रहे हैं
हर मोड़ पर
लड़खड़ाती इंसानियत पर।
काला धुआँ
उखड़ती साँसों पर
दस्तक दे रहा है
क़ुदरत अब
बहुत रूठी हुई लगती है,
मानव सभ्यता
चंद सीढ़ियाँ ही तो
चढ़ी है विकास कीं
कोख में अब संतति
डर-डरकर पलती है।
© रवीन्द्र सिंह यादव





