विकास लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विकास लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 3 मार्च 2021

फिर जंगली हुआ जाय?

जंगली जीवन से उकताकर 

समाज का सृजन किया 

समाज में स्वेच्छाचारी स्वभाव के 

नियंत्रण का विचार और इच्छाशक्ति 

सामाजिक नियमावली लाई 

नैतिकता की समझ भी आई 

सामाजिक मूल्यों की सुधि आई 

ज्ञान,न्याय,समता,विकास,स्वतंत्रता 

और दंड पर बहस हुई

क़ानून का प्रावधान स्वीकार हुआ 

राजा बादशाह से होते हुए 

जनसेवक का विचार लोकतंत्र लाया 

लोगों ने सोचा अब उन्हें जीना आया 

लोकतंत्र में कब तानाशाही आ गई 

आज़ादी / अभिव्यक्ति जब नियंत्रित हुई

तब होश आया 

लालच और भय की दुदुंभी की गूँज में 

चतुर-चालाक वर्ग को 

सत्ता और पूँजी के साथ खड़ा पाया

तो क्या आज़ादी के लिए 

फिर जंगली हुआ जाय?

या संयमी और समझौतावादी हुआ जाय...? 

© रवीन्द्र सिंह यादव    

 

रविवार, 17 जनवरी 2021

पहाड़ और विकास

उस शहर के पश्चिमी छोर पर 
 
एक पहाड़ को काटकर 

रेल पटरी निकाली गई 

नाम नैरो-गेज़ 

धुआँ छोड़ती 

छुकछुक करती 

रूकती-चलती छोटी रेल 

सस्ते में सफ़र कराती 

अविकसित इलाक़ों में जाती 

तीस साल उपरांत 

पुनः जाना हुआ 

न पटरी थी न पहाड़ के अर्द्धांश

न हरियाली न कलरव के अंश

न सँकरी पथरीली पगडंडी 

न चौकीदार की लाल-हरी झंडी   

विकास की तेज़ रफ़्तार 

एक पहाड़ लील गई 

पर्यावरणीय मुग्ध आशा 

मन में ही सील गई 

पहाड़ नीस्त-ओ-नाबूद करने से निकले 

पेड़,खंडे,बोल्डर,गिट्टी,मुरम,मिट्टी,चूरा

ज्यों शाश्वत से नश्वर हो गए हैं 

वे अब समायोजित हो गए हैं   

गलियों,सड़कों,रेल पटरियों,पुलों 
 
ख़ामोश आली-शान इमारतों में 

अपरिमित इंसानी भूख को करते-करते पूरा

उस पहाड़ ने लालची इंसान से

कुछ भी तो नहीं माँगा था 

वह तो अपनी युगों से बसाई बस्ती में भला-चंगा था  

उस दिन से अस्तित्त्वविहीन हुए पहाड़ की 

सिसकियाँ रोज़-रोज़ सुन रहा हूँ... 

प्राकृतिक असंतुलन की ज़ोरदार धमक 

रोज़-रोज़ सुनता ही जा रहा हूँ!

© रवीन्द्र सिंह यादव



शब्दार्थ / WORD MEANINGS 

1. नीस्त-ओ-नाबूद = नष्ट होना, समाप्त होना / DESTRUCTION 

2. अर्द्धांश = आधा अंश, आधा भाग / HALF  PART    

3. आली-शान = शानदार, भव्य / GLORIOUS   

4. शाश्वत = सदैव रहनेवाला, नष्ट न होनेवाला / PERPETUAL 

5. नश्वर = नष्ट होनेवाला, क्षणिक, मिटने योग्य / MORTAL  


शुक्रवार, 7 जून 2019

पर्यावरण अधिकारी




 प्रकृति की, 

स्तब्धकारी ख़ामोशी की, 

गहन व्याख्या करते-करते, 

पुरखा-पुरखिन भी निढाल हो गए, 

सागर, नदियाँ, झरने, पर्वत-पहाड़, 

पोखर-ताल, जीवधारी, हरियाली, झाड़-झँखाड़,

क्या मानव के मातहत निहाल हो गए?

नहीं!... कदापि नहीं!!

औद्योगिक क्राँति, पूँजी का ध्रुवीकरण, 

बेचारा सहमा सकुचाया मासूम पर्यावरण,

खोता जा रहा क़ुदरती आवरण। 


अड़ा है अपने कर्तव्य पर,

एक सरकारी पर्यावरण अधिकारी, 

पर्यावरण क्लियरेंस लेना चाहता है, 

निजी प्रोजेक्ट अधिकारी,

साम-दाम-दंड-भेद सब असफल हुए,

चरित्र ख़रीदने के प्रयास निष्फल हुए,  

अंततः याचक ने कारण पूछा,

सरकारी पर्यावरण अधिकारी, 

प्रस्तावित प्रोजेक्ट-साइट पर जाकर बोला-

देखो! वर्षों पुराना इको-सिस्टम, 

पेड़-पौधों पर छायी हसीं रुमानियत, 

कोयल की कुहू-कुहू, 

कौए की काँव-काँव, 

मयूर का मनोहारी नृत्य,

ऑक्सीजन का घनत्व,  

हिरणों की चंचलता, 

चींटियों की निरंतरता,  

चिड़ियों के प्यारे घोंसले,

बघारना लोमड़ी के चोचले,  

तनों में साँप के कोटर,

दादुर की टर्र-टर्र,  

अँधेरी सुनसान यामिनी में, 

दीप्ति उत्पन्न करते, 

जुगनू का निवास,

पेड़ की लचकदार टहनियों पर, 

तुतलाते तोतों का विलास,

प्रकृति का रसमय संगीत, 

फूल-तितली की पावन प्रीत, 

भँवरों का मधुर गुँजन

टिटहरी का करुण क्रंदन   

बंदरों की उछल-कूद, 

मीठे-रसीले अमरुद...

इन्हें मिटाकर, 

क्या पैदा करोगे...!  

ज़हरीला धुआँ, प्रदूषित जल, 

ध्वनि प्रदूषण, मृद्दा प्रदूषण,

कुंद विवेक, वैचारिक प्रदूषण,   

सीमेंट-सरिया का जंगल,

ख़ुद के लिए मंगल, 

रोगों का स्रोत, 

लाचारों की मौत, 

पूँजी का अंबार, 

उत्पादों का बाज़ार, 

मालिक मालामाल, 

उपभोक्ता कंगाल...


निजी प्रोजेक्ट अधिकारी,

चिढ़कर टोकते हुए बोला-

विकास के लिए, 

ये क़ुर्बानियाँ स्वाभाविक हैं, 

पर्यावरण अधिकारी ने अपना निर्णय सुनाया, 

फ़ाइल पर "नो क्लियरेंस" का टैग लगाया, 

मालिक ने मंत्री को फोन लगाया,

पूछा- प्रकृति-प्रेमी सरस्वती-पुत्र को,

ऐसा पद क्यों थमाया?

अब तक कोई सहयोगी, 

लक्ष्मी-पुत्र आपके हाथ नहीं आया?   

यह कैसी "ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस" नीति है?  

हमारे साथ घोर अनीति है! 

 @रवीन्द्र सिंह यादव  


चित्र साभार : मुकुंद 

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...