पिछले पचास वर्ष
हम
इतने स्वकेन्द्रित तो नहीं थे
मानसिकता के धरातल पर
जहाँ आज हैं
तब इतने तो नहीं थे
दुनिया
विकास करती रही
परमाणु बम बनाने की
अंधी दौड़ चलती रही
भौतिकता के विस्तार में
संवेदनाविहीन हुई
व्यक्ति की पाशविक कुंठा
उत्तरोत्तर विकसित हुई
भूख की चिंता
अब व्यर्थ का चिंतन है
हथियारों की होड़ में
लुट रहा धन है
भारत ने
वर्ण-व्यवस्था का
निरर्थक विकास किया
और वर्गों में बँटी
दुनिया में
कुछ आगे हुआ
तो कहीं
बहुत पीछे रह गया
व्यवस्था बदलने आए
'तीस मार ख़ान'
'बंदर के हाथ लगी मशाल'
