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रविवार, 11 जनवरी 2026

मानव और प्रकृति

चित्र:महेन्द्र सिंह 

तुम भला क्यों अजनबी हो जाना चाहते हो?

एक मौसम-चक्र परिपूर्ण होते-होते 

कितना कुछ है जो बदल जाता है प्रकृति में 

कली से फूल 

फूल में बीज 

बीजों से फिर नये पौधे 

देखो राह की मिट्टी को 

वर्षा में घुल गयी 

महक बिखेरकर धुल गयी 

हो जब सर्द मौसम की सुहानी धूप 

पर्वतों पर प्रकृति सँवारती है रूप 

नियति-क्रम में हरेक पल 

एक-दूसरे से अजनबी ही तो है...

प्रकृति की सर्वोत्तम कृति 

यानी मानव 

माप-गिन रहा है दूरी,दोष,समय,सामान

व्याकुल है कि लोग कैसे रहें परेशान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 27 सितंबर 2020

घुटन का दरिया

 कुछ लोग इसे 

उजाला कह रह हैं 

शायद उन्होंने 

उजाले की परिभाषा 

बरबस बदल दी है 

मुझे तो स्याह तमस में 

बस जुगनुओं की 

दीवानगी नज़र आती है

न्याय जब पहले से तय हो 

तो अर्जित कमाई 

बीवी के ज़ेवर 

बच्चों की ख़ुशियाँ और समय  

खोना क्यों ?

चुना जब कंटकाकीर्ण पथ 

तो ज़ख़्मों पर रोना क्यों?

घुटन का दरिया 

अकुलाहट का तूफ़ान 

प्रतीक्षा के दामन में 

घड़ियाँ गिन रहा है

शबनम में नहाई दूब पर 

बेधड़क चलने का हक 

किसी का छिन रहा है। 

© रवीन्द्र सिंह यादव


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