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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

दो लहरों के बीच

 सोती नदी में 

एक लहर उठी 

किनारे पर आकर 

रेत पर एक नाम लिखकर थम गई 

दूसरी लहर 

किनारे से मिलने चली 

रेत पर लिखा नाम 

न कर सका और विश्राम

पहली लहर के कलात्मक श्रम को पानी में मिला दिया। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

शनिवार, 25 मार्च 2017

मैं मज़दूर हूँ

मैं      मज़दूर      हूँ

किंतु   मजबूर   नहीं,

राह      मिल     गयी

तो  मंज़िल  दूर  नहीं ।


बाँध  बनाऊँ  सड़क  बनाऊँ,

बाज़ारों  की  तड़क-भड़क  बनाऊँ,

जीवन की राहें औरों  की आसान  बनाऊँ,

ख़ुद  पग-पग  पर अपमान सहूँ  ग़म  खाऊँ।


हथियार  बनाऊँ  साज़  बनाऊँ,

सुई       बनाऊँ  जहाज़  बनाऊँ ,

रेल   बनाऊँ   मंच    सजाऊँ,

न     कोई   प्रपंच     रचाऊँ। 


लोग  कहते  हैं -

बादशाहों की पसंद निर्मम थी,

ख़ून-पसीना  बहाने  के बाद,

कटवा  दिये  गये  मेरे  हाथ ,

कैसा  क़ानून  है...?

न्याय  क्यों  लगता  नहीं  मेरे  हाथ?


मुझपर   आरोप  है

आबादी  बढ़ाने  का,

कोई  नहीं  सोचता

मेरी मुश्किलों की परिधि घटाने का।


मेरी  झोपड़ी में

आज भी दिया जलता है,

अँधेरे  महलों  को

मेरा रौशन चेहरा खलता है।


ईश्वर  के  नाम   पर

धूर्त  ठग  लेते   हैं  मुझे,

पीढ़ी-दर-पीढ़ी  चक्रव्यूह  रचकर

शिक्षा और  साधन  से दूर  कर देते  हैं मुझे।


आ  गयीं  मशीनें

छीनने  मेरे  मुँह  का  निबाला,

हाथ   आया  जो  रुपया

बुलाकर  झपट  लेती  मधुशाला।


दबी  हुई  है  मेरी  चीख़ 

 उन  महलों  के   नीचे,

आवाज़  बुलंद करके  रहूँगा

नहीं      हटूँगा     पीछे।



मेरी  मेहनत  के  एवज़  में

जो  देते  मुझको  भीख,

श्रम  का  आदर  करना

अब  जाएँगे  वो  सीख।



रहे  एकता  अमर  हमारी

न   हो   हमसे   भूल,

तभी  खिलेंगे  इस  बग़िया   में

श्रम   के   पावन   फूल।

@रवीन्द्र  सिंह  यादव

         

शनिवार, 12 नवंबर 2016

आशा


उन मासूमों के माता-पिता

आल्हादित थे

रेत के कलात्मक  घरौंदे  देखकर

जो नन्हे हाथों ने चटपट लगन से बनाए थे

हौसलों  की  उन्मुक्त उड़ान  

फूल और पत्तियों से  सजाए थे।


बच्चों का रचनात्मक श्रम 

औरों को भी आकर्षित कर रहा था  

कुछ  और  बच्चे  आए 

जुट  गए उमंगोल्लास से घरौंदा बनाने

मनोहारी शांत नदी का किनारा

ख़ुशनुमा माहौल से चहक रहा था

पक्षियों का कलरव मोहक हो 

आसमान में गूँज रहा था।


अचानक तेज़ हवा बही

नदी का जल

लहरों की शक्ल में

किनारे की ओर उमड़ा

पलभर में नज़ारा बदल गया

मुरझा गए सुकोमल मासूम चेहरे

श्रम ने जो शब्द सृजित किए थे

वे ख़ामोश हो गये थे...!

माता-पिता आशावाद का
 
नीरस-सरस पाठ पढ़ाते हुए

नन्हे-मुन्ने छौनों के 

आँसू पौंछते 

घर लौट आए...!!

#रवीन्द्र_सिंह_यादव 

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