आग धधक रही है
दिखलाई नहीं देती
परिवेश में रह-रहकर गूँजती
दर्दनाक चीख़
सुनाई नहीं देती
लगता है तुम
संवेदना की फ़सल
चट कर गए हो
तुम ज़िंदा हो
लेकिन मर गए हो
मुरझाए मुर्दा-से समाज का
क्या कसूर
सरकारों से कौन कहे
कि तुम मूर्ख और अहंकारी हो
है यह कवि का दस्तूर।
© रवीन्द्र सिंह यादव