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रविवार, 11 जनवरी 2026

मानव और प्रकृति

चित्र:महेन्द्र सिंह 

तुम भला क्यों अजनबी हो जाना चाहते हो?

एक मौसम-चक्र परिपूर्ण होते-होते 

कितना कुछ है जो बदल जाता है प्रकृति में 

कली से फूल 

फूल में बीज 

बीजों से फिर नये पौधे 

देखो राह की मिट्टी को 

वर्षा में घुल गयी 

महक बिखेरकर धुल गयी 

हो जब सर्द मौसम की सुहानी धूप 

पर्वतों पर प्रकृति सँवारती है रूप 

नियति-क्रम में हरेक पल 

एक-दूसरे से अजनबी ही तो है...

प्रकृति की सर्वोत्तम कृति 

यानी मानव 

माप-गिन रहा है दूरी,दोष,समय,सामान

व्याकुल है कि लोग कैसे रहें परेशान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 


शनिवार, 2 दिसंबर 2023

अँधेरा-उजाला और भूख

चित्र:महेन्द्र सिंह 

रात का काजल कितना काला 

भोर प्रतीक्षा-सा हुआ निवाला  

देती चिड़िया चूजों को आश्वासन

सूरज निकले तब मिलेगा राशन

अनमनी रवीनाएँ ले-ले जम्हाई

बिखरा देंगीं धूप जो है अलसाई

भूख से लड़ने भरेंगे पंख उड़ान

किसके माफिक हुआ है जहान?

©रवीन्द्र सिंह यादव 


शब्दार्थ:

1. निवाला (हिंदी) = कौर,गस्सा,ग्रास 

2. राशन / RATION (English) = खाद्यान्न आदि का निश्चित व नियंत्रित मात्रा में वितरण,रसद (अरबी,फ़ारसी)

3. अनमनी (हिंदी) = बेमन से, अप्रसन्न

4.रवीनाएँ = सूरज की किरणें,रश्मियाँ 

5.जम्हाई (हिंदी)  = उबासी, जागते समय मुँह के खुलने की स्वाभाविक प्रक्रिया,जँभाई (देशज), उच्छ्वास (संस्कृत) 

6. अलसाई (हिंदी) = आलसयुक्त,आलस से भरी, सुस्त

7.माफिक (संस्कृत) = अनुकूल,अनुसार, मुवाफ़िक़ (अरबी) 

8.जहान/जहाँ (फ़ारसी) = संसार,दुनिया,लोक,जगत्


     

सोमवार, 20 फ़रवरी 2023

बसंत तुम फिर चले जाओगे



शिशिर ने बसंत को सौंपी थीं  

मौसम की मासूम धड़कनें

अवनि-अंबर में छट गईं 

कोहरे की क़ाएम अड़चनें 

फाल्गुन, चैत्र महीने 

खेत-खलिहान, किसान 

महकती मोहक बयार 

हृदय में रचने लगे सृजन 

गेहूँ-जौ की सुनहरी बालियाँ 

गीत गातीं विहंग-वृंद बोलियाँ

आतुर हुए रंग-बिरंगे फूल-पत्तियाँ 

सजे सरसों के खेत और क्यारियाँ

गुनगुनी धूप समाई  

पुलकित-व्यथित अंतरमन की गहराइयों में 

कोकिला की कोमल कूक 

गूँजी सुदूर सघन अमराइयों में 

गीष्म की प्रताड़ना और पतझड़ का 

कल्पित भय दिखाकर 

बसंत तुम इस बार फिर चले जाओगे...

आस है कि तुम फिर चले आओगे।  

© रवीन्द्र सिंह यादव  


सोमवार, 13 अप्रैल 2020

छत और धूप

करोना काल की 

तालाबंदी ने 

छतें आबाद कर दीं हैं, 

बाग़-बग़िया

सड़कें-गालियाँ

सूनी नाशाद कर दीं हैं। 



छत पर आयी 

किसी रमणी के 

दर्शनार्थ 

आते थे छतों पर युवक,

माँ-बापू की 

आहट पाते ही 

जाते थे 

शरमाकर दुबक।



यह तो 

गए ज़माने की 

आई-गई बात है, 

अब तो 

मोबाइल पर ही 

मनचाही मुलाक़ात है।



वीडियो कॉन्फ़्रेंस 

जुड़े होने का एहसास 

बरक़रार रखे है,

बावरा मन 

तमन्नाओं के सागर में 

उन्मुक्त नौकायन के लिए
  
उम्मीद की पतवार रखे है।



अब छतें निजता का 

ख़याल रखतीं हैं,

पड़ोसियों की हलचल से 

अनभिज्ञ रहने का 

गुमान पाल रखतीं हैं।    



एक-दूसरे के हिस्से की 

चमकीली धूप 

बहुत ऊँचीं छतों ने 

हड़प ली है,

विटामिन-डी की

दवाओं ने 

घरों में खिलौनों की 

जगह हड़प ली है। 



लाचारी में मिली 

धूप ने 

अपना असर किया होगा,

हड्डियों-मांसपेशियों का दर्द

कम हुआ होगा 

दवा-व्यापार का कर्व 

पसर गया होगा। 



इस दौर में 

कुछ ऐसे भी हैं 

जो छतों को मुँहताज हैं

देश की बेघर आबादी

दसकों से  

दरवाज़े-बालकनी के 

इंतज़ार में है 

ताकि वह भी किसी दिन 

ताली-थाली,घंटी बजा सके

दीया-मोमबत्ती जलाकर 

ख़ुद को गर्व से 

देश से जुड़ा 

महसूस सके!
   
©रवीन्द्र सिंह यादव 

सोमवार, 29 जुलाई 2019

क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर






















दिनकर की धूप पाकर 

भोजन बनाता है पेड़ दिनभर,

लक्ष्यहीन अतरंगित असम्पृक्त को 

   भटकन से उबारता है पेड़ दिनभर।  


चतुर्दिक फैली ज़हरीली हवा 

निगलता है पेड़ दिनभर, 

मुफ़्त मयस्सर प्राणवायु 

उगलता है पेड़ दिनभर। 


नीले शून्य में बादलों को 

दिलभर रिझाता है पेड़ दिनभर, 

आते-जाते थके-हारे परिंदों को 

बुलाता है पेड़ दिनभर।



कलरव की प्यारी सरगम 

उदासी में सुनता है पेड़ दिनभर, 

आदमी को अपनी नज़रों में 

उठता-गिरता देखता है पेड़ दिनभर।  


यूनिवर्सिटी में रिसर्च का 

विषय बनता पेड़ दिनभर, 

राजनीति के हाथों सजीले गड्ढे में 

रोपा जाता पेड़ दिनभर। 


पथिक को ठंडी हवा के झौंकों से 

दुलराता पेड़ दिनभर, 

साधनविहीन पाठशाला का 

आसरा बनता पेड़ दिनभर। 


बाग़बान को सुख-चैन की 

रागिनी सुनाता पेड़ दिनभर, 

कलाकारों की साधना का 

आयाम बनता पेड़ दिनभर। 


निर्विवाद इतिहास 

रचता है पेड़ दिनभर,

भौतिकता के अलबेले दौर का 

मज़ाक़ उड़ाता पेड़ दिनभर। 


फलों का भार लादे लचकदार होकर 

जीना सिखाता पेड़ दिनभर, 

पढ़ने जाती नन्हीं मुनिया को 

बढ़ते हुए देखता पेड़ दिनभर। 


खेतों में पसीना बहाते मेहनतकशों को 

मिलीं गालियाँ सुनता पेड़ दिनभर,

सबूत मिटाकर सफ़ेदपोश बने 

अपराधी के अपराध गिनता है पेड़ दिनभर। 


क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर... 

सारे भले कार्य करता है पेड़ दिनभर,

मरकर भी हमारा पेट भर जाता है शजर  

फिर क्यों काटा जाता है पेड़ दिनभर ? 

© रवीन्द्र सिंह यादव 




मंगलवार, 27 नवंबर 2018

धूप (वर्ण पिरामिड )




ये 
धूप 
जागीर  
है सूर्य की  
तरसाती है 
महानगर में 
बेबस इंसान को। 







लो 
आयी 
रवीना 
चीरकर 
घना कुहाँसा 
एहसास लायी 
मख़मली धूप-सा। 



आ 
गयी 
सर्दी भी 
मख़मली 
धूप लेकर 
कुहाँसा छा रहा 
दृश्य अदृश्य होने। 



वो 
देखो 
सेकती 
गुनगुनी 
धूप छज्जे पे 
अख़बार लिये 
चाय पीती दादी माँ।  
 © रवीन्द्र सिंह यादव




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