मानवता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मानवता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

किसको क्या मिला?


 तुच्छताओं को 

स्थाई स्थान ढूँढ़ना था 

तो राजनीति में समा गईं

हताशाओं को 

तलाश थी मुकम्मल ठिकाने की 

तो कापुरुष में समा गईं

चतुराई चपला-सी चंचल 

भविष्य बनाने निकली 

तो बाज़ारों की रौनक में बस गई 

जीने की चाह 

भटकती रही 

सन्नाटोंभरे खंडहरों में 

लड़खड़ाकर गिरने से पहले 

सँभल गई

मानवता पूँजी के अत्याचार झेलते-झेलते 

क्षत-विक्षत होकर ख़ुद से आश्वस्त हुई 

तो विचार-क्रांति के साथ कोहरे को चीरती चली गई।

© रवीन्द्र सिंह यादव


शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

समय की स्लेट पर

करोना काल के 

विवश साक्षी हैं हम,

ऐतिहासिक तारीख़ के साथ 

याद किए जाने के 

महत्त्वाकाँक्षी हैं हम। 

दर्ज हो रहे हैं

क़िस्से-दर-क़िस्से 

मानवता के विस्तार 

और संवेदनाविहीन व्यवहार के

समय की स्लेट पर 

लिखी जा रही है इबारत,

पूँजी के आसपास 

टिकी है 

सरकारी 

ग़ैर-सरकारी सोच 

खिड़कियाँ बनाना 

भूल गए हैं हम 

खड़ी कर दी है

भावशून्य इमारत

जिसमें सब दिखेंगे 

हाथ धोते हुए, 

चेहरे पर मास्क का 

अनचाहा भार ढोते हुए।

जिसके पृथक-पृथक तल में 

अपने-अपने कंधों पर 

लिए खड़े हैं हम अपनी लाशें,

विद्वता को नकार 

भीड़ में मुँह छिपाकर 

हम गिन रहे हैं 

अपनी बची-खुचीं सांसें।  

© रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश


अरे!

यह क्या ?

अराजकता में झुलसता मेरा देश,

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश।


सरकारी शब्दजाल ने

ऊबड़खाबड़ घाटियों में धकेला है,

शहर-शहर विरोध का

महाविकट स्वस्फूर्त रेला है,

होंठ भींचे मुट्ठियाँ कसते 

बेरोज़गार नौजवान

कोई मुँह छिपाकर देशद्रोही

जलाता अपना ही प्यारा देश,

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश।


रक्षकों को भक्षक बनते देख रहा हूँ,

गुनाहगार को सरपरस्ती मिलते देख रहा हूँ,

नेताओं को ज़हर उगलते देख रहा हूँ,

दुष्ट ने धारण किया है

भलेमानस का नक़ली वेश,

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश।


दबाने के लिये विरोधी-स्वर

केस ही केस दर्ज़ करती सरकार

औरतों के बदन से खसोट लेगी जेवर

बच्चों के मुँह से कौर

कुछ वकीलों के हो जायेंगे

सफ़ेद से गहरे काले केश

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश।


मानवता के मख़ौल में

खीज नहीं तरस आता है,

देखिए!

चरित्र-निर्माण का भव्य भवन

अब कितना खोखला नज़र आता है,

नफ़रत के तह-ख़ानों में

बैठे हैं सियासतदाँ

इनको भाता सड़कों पर

बहता ख़ून और क्लेश

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश।


दमन दहशत दुर्भावना से

जी नहीं भरता सत्ताधीशों का,

अपने लबादे में रखते हैं ख़ंजर छिपाकर

क़त्ल होता नागरिक के नाज़ुक अरमानों का

गुम है रहबर कहीं बेचारे मासूम शीशों का,

धनपति पाखंडी अवसरवादी

जमकर लूट रहे हैं देश,

अभागी चीख़ में सिसकता परिवेश।

© रवीन्द्र सिंह यादव
    

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...