नारियल बाहर भूरा
अंदर गोरा पनीला,
बाहर दिखता रुखा
अंदर नरम लचीला।
बाहर सख़्त खुरदरा
भीतर उससे विपरीत,
दिखते देशी, हैं अँग्रेज़
है कैसी जग की रीत।
युग बीत गये बहुतेरे
बदला न मन का फेर,
अंदर कठोर बाहर रसीला
मिलता खट्टा-मीठा बेर।
हैं क़ुदरत के खेल निराले
जीवन का मर्म सरल-सा,
दृष्टिकोण और मंथन में
आ रहा उबाल गरल-सा।
© रवीन्द्र सिंह यादव