ज़माना
बहुत बुरा है
कहते हुए
सुने जाते हैं लोग
मझदार से निकालकर
किनारे पर कश्ती डुबोना
ऐसा तो नहीं चाहते हैं लोग
दरीचों के सीनों में
दफ़्न हैं राज़ कितने
आहिस्ता-आहिस्ता
बताते हैं लोग
दास्तान-ए-हसरत
मुसाफ़िर कब सुनाते हैं
गले लगाने से पहले
आजमाते हैं लोग
बिजलियाँ अक्सर
गिरती रहतीं हैं
फिर भी आशियाना
बनाते हैं लोग
वो माँगता फिर रहा है
औरों के लिए दुआ
न जाने क्यों उसे
पागल कहते हैं लोग।
© रवीन्द्र सिंह यादव