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शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

जिया जो दूसरों के सपनों पर


मत टिकाओ 
उम्मीद को अपनी 
किसी लफ़्फ़ाज़ के सहारे, 
नहीं  तो डूब जायेगी 
नैया एक दिन 
देखते रह जाओगे किनारे। 


दरारें दिख रहीं हैं 
दूर से मुझको 
संयम के बाँध 
 हैं अब फूटने वाले ,
जायेंगे टूट जब एक दिन 
कच्चे विश्वास के धागे, 
कहेगा कौन तुमको 
कि हो तुम हमारे। 


हो बेहतरी की बात 
या ख़ुशियों भरे दिन हों, 
हलक़ सूखा है 
अब तो इंतज़ार में 
 लगते आज-कल अपने 
ज्यों रौशनी बिन हों, 
देखता हूँ रोज़-रोज़ 
लुटते हुए सपने 
बेहरे हुए को 
कोई कब तक पुकारे। 


थाम लो दामन 
वक़्त की चुनौती का  
राह अपनी बना डालो, 
खोखले आश्वासन 
होते नहीं ज़ख़्म का मरहम 
बुझते चराग़ में 
ज़रा-सा सब्र का 
तेल फिर डालो, 
जिया जो 
दूसरों के सपनों पर 
ज़िन्दगी में झेलता 
ज़िल्लत वही सांझ-सकारे। 

# रवीन्द्र सिंह यादव 

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

ये कहाँ से आ गयी बहार है




ये    कहाँ    से

आ  गयी   बहार   है  ,

बंद     तो

मेरी   गली   का  द्वार  है। ....(1)



ख़्वाहिशें   टकरा   के

चूर   हो    गयीं,

हसरतों   का   दर्द

अभी   उधार   है।

बंद     तो

मेरी  गली   का  द्वार  है।....(2)




नफ़रतों    के    तीर

छलनी  कर   गए    जिगर  ,

वक़्त     लाएगा     मरहम

जिसका      इंतज़ार      है।

बंद    तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।.....(3)




बदल    गए      हैं

इश्क़   के  अंदाज़  अब,

उल्फ़तों    का

सज   गया   बाज़ार   है।

बंद     तो

मेरी   गली   का   द्वार  है।....(4)




अरमान  बिखर  जाएँ  तो

संभाल     लेना         दिल,

छीनता       है           एक

वो      देता      हज़ार    है।  

बंद    तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।.....(5)



टूटते       हैं      रोज़-रोज़

तारे        आसमान      में ,

"रवीन्द्र "        को       तो

ज़िन्दगी    से    प्यार   है।

बंद     तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।...(6)



   @रवीन्द्र  सिंह  यादव

इस  रचना  का  यू  ट्यूब   विडियो  लिंक-  https://youtu.be/6n-Og0O8cTE

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