सोमवार, 22 जून 2026

सीढ़ी जो उदास थी...


                             चित्र साभार : गूगल 

बुज़ुर्ग सीढ़ी क्या कहे अपनी दास्तान 

रोती है ज़ार-ज़ार हो जब सूना मकान

बेफ़िक्र उत्सुक हो चढ़ जाते हैं सीढ़ी 

भूतल को सँभलकर उतरते हैं सीढ़ी 


ममता, प्रेम, घृणा, आकांक्षा 

सब चढ़े-उतरे हैं सीढ़ी से 

निर्माता के उर में उतर गयी है 

भव्य नियोजित सीढ़ी-दर-सीढ़ी 


इस सीढ़ी का वैभवपूर्ण इतिहास 

लिखेगा कोई धीर शोधार्थी 

आधुनिकता के अंधड़ में सूनी हुई तो क्या 

सीढ़ी संग जीने वाले थे रसिक संगी-साथी.

©रवीन्द्र सिंह यादव

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मंगलवार, 2 जून 2026

युद्ध में ध्वस्त हुआ घर

युद्ध में ध्वस्त हुआ घर 

गया है तार-तार बिखर

धधकते अंगारों पर 

आओ बरसो प्यारे जलधर


गृहस्वामी का कुंबा गया

द्वार पर लहलहाता अमलतास झुलस गया 

चींटी,चूहा,चिड़िया,दीमक और कॉकरोच भी  

अब गये हैं सारे के सारे मर


बनाई थी जो पेंटिंग 

नन्हे सुकोमल हाथों ने 

मासूमों के अनमोल रत्न

रंग-बिरंगे खिलखिलाते खिलौने 

विद्यार्जन हेतु सहेजी किताबें-क़लम 

माँ के बुने हुए गर्म स्वेटर

पिता की सजायी ईंटें  

सभी की पसंद सब्ज़ नर्सरी

सहेजे गये भोज्य-पदार्थ-दवाई 

आधुनिकता का साज़-ओ-सामान 

संभावनाओं का विस्तृत विराट वितान 

यादें-रिश्ते-सपने सब 

धमाके में ख़ाक हुए जलकर


आत्मग्लानि से भरेगा कभी 

वह क्रूर विकृत दिमाग़ भी  

बिला गये हैं ये प्राणी और प्रतीक  

जिसके वर्ज्य आतप आदेश पर?  

© रवीन्द्र सिंह यादव 

  

शब्दार्थ:

1. कुंबा (संस्कृत) = परिवार, घराना, क़बीला 

2. सब्ज़ (फ़ारसी) = हरा रंग, रंग में हरी,हरियाली 

3. ख़ाक (फ़ारसी)= मिट्टी 

4.जलधर(संस्कृत) = बादल, संगीत का एक राग

5. साज़ (फ़ारसी) = संगीत का उपकरण, वाद्ययंत्र

6.आत्मग्लानि (संस्कृत) = पश्चाताप, पछतावा, खेद  

7. बिला गये (हिंदी) = ग़ाएब हो गये, विलुप्त हुए

8. वर्ज्य (संस्कृत) = वर्जन, निषेध, मनाही 

9. आतप (संस्कृत) = गर्मी, उष्णता,धूप,तपन,ताप    


  

शनिवार, 16 मई 2026

कॉकरोच और परजीवी


जिसके मन-मस्तिष्क पटल पर,

घनीभूत घनघोर घृणा का डेरा है,

सजग नागरिक के प्रति जिसके उर में,

संवेदना और भावों का अंधेरा है,

कुंठा और खिन्नता का,

जिसमें आकंठ बसेरा है.

कैसे वह संविधान-संरक्षक होने का अधिकारी है?


हिलाकर चूलें शासन और प्रशासन की,

बहाकर ख़ून-पसीना पारदर्शिता जो लाते हैं,

उन प्रबुद्ध कर्मठ कार्यकर्ताओं को,

जो 'कॉकरोच-परजीवी' बतलाते हैं,

लोकतंत्र के सजग सक्रिय प्रहरियों को,

यह अपमान अन्याय सर्वथा भारी है!


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,

या हो सूचना का अधिकार,

संविधान ने हमको सौंपे,

ये पावन अनुपम उपहार।


किसी व्यक्ति विशेष की कृपा नहीं,

ये संविधान की अनुकम्पा है,

ये अधिकार किसी की जागीर नहीं,

यह तो जन-जन की कमाई है!

लोकतंत्र की इस बगिया में

सबकी साझी अरुणाई है।

©रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

जारी है युद्ध

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जन्मे 

कुबुद्धि बालक  

अब तक तो वयोवृद्ध हो चुके हैं

हिंसक उन्माद में डूबकर

मानसिक संतुलन खो चुके हैं  

अमेरिका और इज़राइल 

मिलकर लड़ रहे हैं युद्ध 

अकेले ईरान से

महीना भर भी कम लग रहा है इन्हें 

लड़ते-लड़ते भीषण युद्ध 

मारे जा रहे हैं मासूम बच्चे 

जिनका कोई अपराध नहीं 

मारे जा रहे हैं लोग 

जिनके पास बचाव के लिये कोई हथियार नहीं 

मारे जा रहे हैं लगातार 

निरपराध परिंदे और सुकोमल तितलियाँ 

जो अनभिज्ञ हैं विकृत मानवीय सोच से 

क्या दोष है पर्यावरण का 

जो डूब गया है 

बिषैले बारूद के गर्द-ओ-ग़ुबार में 

सामूहिक मृत्यु को सहज बनाते 

विवेकहीन नेताओं के आदेश

भरा है जिनमें तकनीकी आवेश  

अपने लिये सुखद मृत्यु की कल्पना में डूबे हैं 

धिक्कार है ऐसे संवेदनाविहीन दिमाग़ों पर!

जागो शांति के मसीहाओ!

वक़्त रहते पृथ्वी को वीरान होने से बचा लो!

और कोई कुबुद्धि ऐसी क्षमता में न हो 

जो ले जाए दुनिया को 

परमाणु-युद्ध की ओर 

विवेकशील मस्तिष्क को ही सौंपना 

अब देश की बाग-डोर!    

 © रवीन्द्र सिंह यादव  


रविवार, 11 जनवरी 2026

मानव और प्रकृति

चित्र:महेन्द्र सिंह 

तुम भला क्यों अजनबी हो जाना चाहते हो?

एक मौसम-चक्र परिपूर्ण होते-होते 

कितना कुछ है जो बदल जाता है प्रकृति में 

कली से फूल 

फूल में बीज 

बीजों से फिर नये पौधे 

देखो राह की मिट्टी को 

वर्षा में घुल गयी 

महक बिखेरकर धुल गयी 

हो जब सर्द मौसम की सुहानी धूप 

पर्वतों पर प्रकृति सँवारती है रूप 

नियति-क्रम में हरेक पल 

एक-दूसरे से अजनबी ही तो है...

प्रकृति की सर्वोत्तम कृति 

यानी मानव 

माप-गिन रहा है दूरी,दोष,समय,सामान

व्याकुल है कि लोग कैसे रहें परेशान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 


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सीढ़ी जो उदास थी...

                             चित्र साभार : गूगल  बुज़ुर्ग सीढ़ी क्या कहे अपनी दास्तान  रोती है ज़ार-ज़ार हो जब सूना मकान बेफ़िक्र उत्सुक हो चढ़ जा...