दीवार उठती है
बाँटती है
आचार-विचार
रहन-सहन
दशा-दिशा
अँगारे-धुआँ
कोई सेंध लगाकर
देख लेता है आरपार
एक ओर
कलात्मक चित्रकारी की भरमार
दूसरी ओर
कीलें ठोककर अस्थायी छप्पर
हवा में हवा होती नैतिकता
के परिवेश में
नंगनाच करती भौतिकता
बैठेंगे खग-वृन्द दीवार पर
किसी की पूँछ
किसी की चोंच
देखेंगे नौनिहाल
दीवार ढोती है
व्यक्ति की निजता
अस्थायी सुरक्षा का पता
संकीर्णता के कीड़े-मकोड़े
सहती है महत्त्वाकाँक्षा के हथौड़े
प्रकृति सिहर उठती है
असीम वेदना से
सहती है नादान इंसान के
स्वकेन्द्रित क्रिया-कलाप
हवा-पानी धूप-चाँदनी से
कहती है-
भेदभाव हमारी नीयत में नहीं
सारमय नीरव इशारे समझने की दक्षता
उन्मादी मग़्ज़वाली खोपड़ी में नहीं।
© रवीन्द्र सिंह यादव