गुरुवार, 23 जुलाई 2026

युवाशक्ति

  युवा-पीढ़ी को समर्पित मेरी यह कविता सन 1998 में आकाशवाणी ग्वालियर म.प्र.से प्रसारित हुई थी. आज पुनः स्मृति में गूँज उठी-


युवा हूँ मैं

निरुत्साह से अनछुआ हूँ मैं

अक्षय ऊर्जा का भंडार हूँ मैं 

दक्षता धारण किये निडर हूँ मैं 


सभ्यता के अथाह सागर की गोद में 

अस्तित्त्व में आया हुआ द्वीप हूँ मैं 

घृणा के गान से उपजी 

प्रचंड आँधियों के बीच जलता हुआ दीप हूँ मैं 


घात-प्रतिघात के कठिन दौर से 

बेख़ौफ़ गुज़र रहा हूँ मैं 

ज़माने की नज़र में अब 

चुभता नहीं, सुधर रहा हूँ मैं 


गीदड़ों के कोलाहल में 

गूँजता हुआ सिंहनाद हूँ मैं 

घनेरे बादलों को चीरकर 

निकला हुआ शुभ्र चाँद हूँ मैं!

©रवीन्द्र सिंह यादव 


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