सूख गया
बेकल आँखों का पानी,
कहने लगे हैं लोग
यह तो है
गुज़रे ज़माने की कहानी।
मिला करते थे हम
मेलों
त्योहारों
उत्सवों में,
मिलने की
फ़ुर्सत किसे अब
नस-नस में दौड़ती है
नशा-ए-इंटरनेट की रवानी।
लिखते थे ख़त में
सहज सरल शब्द
लिपट जाते थे उनमें
स्पंदन भावों के बंधन,
आज उपलब्ध हुए
साधन इतने आधुनिक
कि डरपोक सरकार ने भी
राज़ की बात जानी।
लगता है
सब फ़ासले मिट गये
हमारे दरमियाँ
बदलीं हैं ज़माने की हवाएँ,
लोकतंत्र है अब तो
राजा-रानी की
हो गयी कहानी पुरानी।
© रवीन्द्र सिंह यादव

