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रविवार, 16 जून 2024

तपिश और पेड़

चित्र: महेन्द्र सिंह 


 गमलों में पेड़ लगाकर 

आत्ममुग्ध होता समाज 

व्यथित है 

सूरज की प्रचंड तपिश से

हाँ, बदलेगा वातावरण 

बड़ी होती इस कोशिश से 


पेड़ की जड़ 

खींचती जल भूतल से 

पहुँचाती आँतरिक वाहिनियों के ज़रिये 

पत्ती के स्टोमेटा तक 

वाष्पोत्सर्जन वातावरण को देता ठंडक

छाया में आती राहत की ठसक

 

जो सूख गया या काटा गया पेड़ 

तो देखा गया जलते हुए 

सर्दी के अलाव में 

या घर की शोभा बनते हुए 


पेड़ तो स्वयं उगते हैं 

सजते-सँवरते हैं वन-उपवन होकर 

कुदृष्टि आदमी की उजाड़ती है वृक्ष 

अति भौतिकता का दास होकर

उजड़ते वन बसती बस्तियाँ 

बढ़ता वातावरण का तापमान 

जीवन के लिए ख़तरा


वृक्षों को जबरन मुक्ति देता आदमी 

कभी झाँक लेगा अपने भीतर 

रोते-सिसकते मिलेंगे 

चिड़िया,कोयल,मोर,बटेर,तीतर। 

 ©रवीन्द्र सिंह यादव

  


शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

सर्दी

 

चित्र:महेन्द्र सिंह 

सर्दी तुम हो बलवान 

कल-कल करती नदी का प्रवाह 

रोकने भर की है तुम में जान

जम जाती है बहती नदी 

बर्फ़ीली हवाओं को तीखा बनाने 

आती हो निरीह को सहना सिखाने  

तुम जब कोहरे के पंख लेकर 

उतरती हो धरा पर 

दृष्टि क्षमता घट जाती है जीव की

चिड़िया भी उड़ नहीं पाती पर पसार कर   

अदृश्य हो जाते हैं भानु,शशि और सितारे

भौतिक जीवन चलता है तकनीक के सहारे 

एक ह्रदय है 

धड़-धड़ धड़कता रहता है जीवनभर अनवरत 

जमने नहीं देता धमनियों-शिराओं में बहता रक्त

इसके भी अपने मौसम हैं 

अंगों के सह-अस्तित्त्व को सहेजे  

कुछ मनचीते 

कुछ बोझिल-से!    

©रवीन्द्र सिंह यादव




शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

भेड़ की ऊन

चित्र: महेन्द्र सिंह 

मासूम भेड़ की ऊन 

आधुनिक मशीनों से 

उतारी जा रही है

भेड़ की असहमति 

ठुकराई जा रही है

ज़बरन छीना जा रहा है   

सौम्य कोमल क़ुदरती कवच

है कैसा इंसानी बुद्धिमत्ता का सच   

तौहीन सहते-सहते 

गुज़ारेगी ठंड का मौसम 

कोसते काँपते-ठिठुरते हुए

कोई लुत्फ़ उठा रहा होगा

सर्दी के मौसम में इच्छित उष्णता का  

ऊनी रज़ाई ओढ़ते हुए!

 ©रवीन्द्र सिंह यादव

 

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