परागरहित चंपा पुष्प उपेक्षित भाव की
पीड़ा से गुज़रता है
जब मधुमक्खियाँ
उससे किनारा कर जातीं हैं
पराग चूसने
नीम के फूलों तक चलीं जातीं हैं
पराग देकर
फूल खिल जाते हैं
फूल होने पर इठलाते हैं
मानव-ज़ात को
शहद का छत्ता देकर
मधुमक्खियाँ
अतिशय आनंद से
आप्लावित हो चहकतीं हैं
वे आशान्वित रहतीं हैं
वे जानतीं हैं
उनका श्रम-ज्ञान ज़ाया नहीं होगा
अनेक फूलों से
संग्रहित हुए पराग से
निर्मित निर्मल मधु
उस मानव में बसी
कलुषता मिटाएगा
जो मानव-मानव में भेद करता है
किसी न किसी फूल का पावन पराग
उसकी जिव्हा से मस्तिष्क तक
ह्रदय से रग-रग तक
पवित्र विचारों की
मिठास घोलेगा
मन-बुद्धि-संस्कार के
सँकरे रास्ते खोलेगा
और वह एक दिन
प्रकृति को धन्यवाद बोलेगा।
© रवीन्द्र सिंह यादव