नाव डगमग डोली
तो
माँझी पर
टिक गयीं
आशंकित आशान्वित आँखें,
कोहरा खा गया
दिन का भी उजाला
अनुरक्त हो भँवरे की
प्रतीक्षा कर रहीं सुमन पाँखें।
सड़क-पुल के टेंडर
अभी बाक़ी हैं
कुछ अनजाने इलाक़ों में
बहती नदियों और पगडंडियों के,
अपने आदमी को
मिले सरकारी सौग़ात
इस तरह भँवर में
अनवरत घूमते सोपान प्रगति के।
विकल है आज तो बेकल मन
परिवेश में गूँजता
चीत्कार का व्याकुल स्वर,
प्रभा-मंडल में यह कैसा नक़ली आलोक
नीरव निशा की गोद में
तनिक विश्राम करके
उठ खड़ी होती है जिजीविषा
अनायास सिहरन का उन्मोचन कर।
© रवीन्द्र सिंह यादव
