दोपहर बनकर
अक्सर न आया करो,
सुबह-शाम भी
कभी बन जाया करो।
चिलचिलाती धूप में
तपना है दूर तक,
कभी शीतल चाँदनी
में भी नहाया करो।
सुबह-शाम भी
कभी बन जाया करो।
सुबकता है दिल
यादों के लम्बे सफ़र में,
कभी ढलते आँसू
रोकने आ जाया करो।
सुबह-शाम भी
कभी बन जाया करो।
बदलती है पल-पल
चंचल ज़िन्दगानी,
हमें भी दुःख-सुख में
अपने बुलाया करो।
सुबह-शाम भी
कभी बन जाया करो।
दरिया का पानी
हो जाय न मटमैला,
झाड़न दुखों की धारा में
यों न बहाया करो।
सुबह-शाम भी
कभी बन जाया करो।
#रवीन्द्र सिंह यादव
#रवीन्द्र सिंह यादव