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शुक्रवार, 19 मार्च 2021

विकास और भारत


याद करो 

पिछले पचास वर्ष 

हम 

इतने स्वकेन्द्रित तो नहीं थे

मानसिकता के धरातल पर 

जहाँ आज हैं 

तब इतने तो नहीं थे  

दुनिया 

विकास करती रही

परमाणु बम बनाने की 

अंधी दौड़ चलती रही 

भौतिकता के विस्तार में

संवेदनाविहीन हुई

व्यक्ति की पाशविक कुंठा 

उत्तरोत्तर विकसित हुई 

भूख की चिंता 

अब व्यर्थ का चिंतन है

हथियारों की होड़ में 

लुट रहा धन है   

भारत ने 

वर्ण-व्यवस्था का 

निरर्थक विकास किया 

और वर्गों में बँटी 

दुनिया में 

कुछ आगे हुआ 

तो कहीं 

बहुत पीछे रह गया 

व्यवस्था बदलने आए 

'तीस मार ख़ान' 

'बंदर के हाथ लगी मशाल'

कहावत चरितार्थ करते रहे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

युद्ध


अतीत में युद्ध हुए हैं 


महत्त्वाकाँक्षा मुनाफ़ा का

 

मातमी मुकुट धरकर 


या अपमान और कुंठाओं से त्रस्त 


मानवीय प्रकृति की 


बिडंबनाओं में उलझकर 


करोना-काल में स्थगित है


युद्ध-सामग्री क्रय-विक्रय 


संयुक्त युद्धाभ्यास 


परमाणु बम परीक्षण


अवैध हथियारों की खेप


मौन है विप्लवी लय


मानवता को आहत करने 


कैसे रचें महाभीषण   

  

युद्धक-षड्यंत्र


गोपनीय मंत्रणाओं को 


कैसे आयोजित करे 


हलकान शासन-तंत्र 


अलसाई सरहदों पर 


सन्नाटा और शांति


शिद्दत से महसूसकर


प्रबुद्ध मानवता लेती है  


पुरसुकून की सांस


बेज़मीरी इंसान की 


बन गयी है तारीख़ी फांस। 


 ©रवीन्द्र सिंह यादव  


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जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...